lets Try prayash

मैं कोई लेखक नहीं,
मुझे तो कुछ आता नहीं।
हालात ने सीखा दिया मुझे,
गुरू से ज्ञान मिला मुझे।
मुझसे बड़ी परिस्थितियाँ मेरी,
पुस्तक लिखवाई जो मुझसे ऐसी।
जो बदले जिन्दगी सबकी,
पढ़कर देखो एक बार तो इसको।
फिर अपनी किस्मत को बदलो,
सोचकर थोड़ा, सोच तो बदलो।
करके बड़ा कुछ, अपना नाम कर दो,
परिस्थितियों से लड़कर तो देखो,
जमाने को अपनी मुट्ठी में कर लो।
जिस तरह भाषा की एक किरण निराशा के बादलों को खत्म कर देती है। उसी तरह यह पुस्तक भी सूर्य की किरणों की भाँति आपके जीवन के अंधकार को भेदकर आशाओं के दीपकों को प्रज्वलित करने में सक्षम हो। ऐसा मेरा इसे लिखने में सुहृदयात्मक प्रयास है।

पाठकों से अनुरोध

  यह पुस्तक मात्र विद्यार्थियों की व्यक्तिगत समस्याएँ जिनके कारण मानसिक संताप से परेशान होने से दिशा भ्रमित होकर अनुचित कदमों को उठा लेते हैं या सुपथ से कुपथ की ओर अग्रसर होते हैं तथा अपने माता-पिता और गुरूजनों से दुव्र्यवहार करने लगते हैं और माता-पिता व अपने गुरू की आज्ञा की अवहेलना करते हैं। माता-पिता व गुरू के कहने या समझाने पर भी नहीं मानते हैं। उनकी मानसिक व्यथाओं को दूर कर उनके सामने पूरे जीवन में क्या करना चाहिए? कैसे करना चाहिए? इस ओर उनकी सोच को बदलने हेतु एक छोटा सा प्रयास किया गया है।
 सभी अभिभावकों व अध्यापकों से अनुरोध है, कि इस पुस्तक को अधिक से अधिक संख्या में अपने बच्चों व विद्यार्थियों को पढ़ने के लिए प्रेरित करें। जिससे एक नई युवा पीढ़ी को वास्तविक रूप से सही मार्गदर्शन देकर हम सभ्य सुसंस्कारित भारत देष को अपनी वास्तविक परछाई वापस लौटा सके।
 इस पुस्तक को इस ढंग से भी लिखने की कोशिश की गई है, कि अभिभावक व अध्यापक अपने विद्यार्थियों व अपने बच्चों को किस तरह से समझायें। आज के युग में अत्याधुनिक मनोरंजन के साधनों का जहाँ वह दुरूपयोग कर शिक्षा से दूर हो रहे है, वहीं उन साधनों के प्रति उनका नजरिया बदल कर उन्हीं साधनों के सदुपयोग द्वारा किस प्रकार उनसे शिक्षा भीग्रहण करें।
 छोटी-छोटी कमजोरियों को दूर करने मात्र से बड़ी-बड़ी खुबियाँ हासिल कर व्यक्ति इस जीवन में स्वयं को कितनी सहजता से सफल बना सकता है। अपने आप को सफल बनाने के लिए अपने आपको ही बदलना या ढालना पड़ता है न कि दूसरों को।
 जीवन से सम्बंधित विस्तृत सभी अनुभवों व नजरियों को एक संक्षेप रूप में समझाने की कोषिष की गई है। बच्चों को समझाने का सबसे आसान माध्यम कहानी व कविताएं होती है, अतः इसमें कुछ तथ्यों को कहानी व कविता के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इस पुस्तक में लिखित सभी कहानियाँ महाभारत ग्रंथ से ली गई है तथा सभी कहानियाँ संक्षेप रूप में लिखी गयी है। किसी छोटी सी बात को विस्तृत करना जितना आसान होता है, उतना ही कठिन, किसी बड़ी बात को संक्षेप में कहना होता है। अतः इसमें किसी भी प्रकार की त्रुटि के लिए क्षमा करें।

भाग-1
शिक्षा

-प्रस्तावना-
  1. शिक्षा
  2. गुरू
  3. शिष्य
  4. शिष्य का जीवन काल
    1. गर्भावस्था-
    1. बाल्यावस्था-कच्ची मिट्टी
    1. प्राथमिक-चाक पर रखकर घूमाना प्रारम्भ करना।
    1. उच्च प्राथमिक-घूमते हुये चाक पर मिट्टी को आकार देना।
    1. माध्यमिक-सूखने के लिए रखना।
    1. उच्च माध्यमिक-पकाने की काबिलियत का निर्णय लेना।
    1. महाविद्यालय-अग्नि में पकाना।
  5. विशय
    1. महत्त्व
    1. पढ़ने का तरीका
  6. वातावरण
    1. विद्यार्थी चक्र
    1. मोबाइल
    1. दोस्त
    1. संगीत
    1. फिल्में
  7. समस्या-समाधान
    1. विद्यार्थी
    1. अभिभावक

Part-2
सफलता

-प्रस्तावना-
  1. सफलता
    1. सफलता क्या है?
    1. सफल बनने का रास्ता
    1. सफल बनने का रास्ता कौन बता सकता है?
    1. सफल कौन हो सकता है?
    1. सफल बनने के लिए क्या करें?
  2. मनुष्य
  3. मनुष्य का षारीरिक व्यक्तित्त्व-
  4. मनुष्य के गुण
  5. मनुष्य के अवगुण
  6. मनुष्य के भाव
  7. मनुष्य की इच्छाऐं (षारीरिक व मानसिक)-
  8. मनुष्य की आवष्यकताएँ-
  9. मनुष्य के सम्बन्ध
  10. मनुष्य के चार पुरूशार्थ-
  11. मनुष्य के चार पुरूशार्थ-
  12. मनुष्य को प्रभावित करने वाले कारक-
  13. आय-व्यय-दान-पुण्य
  14. सफलता के सूत्र
  15. उपसंहार-

----- भूमिका -----

सपने भी बड़ी प्यारी चीज होती है।
---------- होती है ना।
  जैसे खाने-पीने की चीजों का नाम सुनते हैं, तो मुँह में पानी आ जाता है। वैसे ही सपना शब्द सुनते ही आपके मन में महक भर गई होगी।
  क्योंकि 15-16 साल की उम्र से व्यक्ति हकीकत की दुनियाँ से दूर हटता जाता है और सपनों की दुनियाँ के पास पहुँचता जाता है। 15-16 साल की उम्र तक पहुँचते ही सपने प्रारम्भ हो जाते हैं, और मन तेज और भी बहुत तेज दौड़ने लगता है।
  किससे शादी होगी? कैसे होगी? षादी के बाद ऐसा होगा, वैसा होगा, बच्चे होगें। यहाँ तक भी नहीं रूकते हैं और आगे तक... उसका नाम सचिन रखूँगा, सलमान रखूँगा... बस इतना ही नहीं इससे भी आगे... उन्हें इस स्कूल में, नहीं, इसमें नहीं, उसमें प्रवेष कराऊँगा, उस कॉलेज में... डॉक्टर बनाऊँगा, इंजीनियर बनाऊँगा... आदि।
  लेकिन आगे क्या होता है? कैसे होता है? इसका पता नहीं।
  हर व्यक्ति इतना सोचता है, या नहीं फिर भी इतना तो है ही, कि जब बच्चा विद्यालय जाने के काबिल होता है, जब व्यक्ति अपने बच्चे को पहले दिन विद्यालय में प्रवेश कराने के लिए ले जाता है। तब बच्चे के स्वयं का कोई किसी प्रकार का लक्ष्य या उद्देश्य नहीं होता, बल्कि माता-पिता के स्वयं का लक्ष्य होता है कि वह बच्चे को क्या बनाना चाहते हैं?
  किन्तु धीरे-धीरे बच्चा बड़ा होता है, और हर साल नई कक्षा में जाता है और हर नई कक्षा में उसकी अपनी योग्यता के आधार पर उसके उद्देश्य बदलते जाते हैं। अंतोगत्वा बेरोजगारी की लाइन में खड़ा हो जाता है।
  -----फिर बड़ी शान से कहता है-
‘‘पापा कहते हैं बेटा बड़ा काम करेगा।
डिग्रियाँ लेकर बेरोजगारी का नाम करेगा।’’
  वह पूरी उम्र उन डिग्रियों का बोझ उठाता रहता है और उन 5-10 कागजों की रद्दी को बेचने पर एक वक्त का खाना भी नहीं खरीद सकता, न ही उन्हें फाड़कर डस्टबिन में फेंकने को उसका जी चाहता है।
जिन काॅलेजों को समझा था, सफलता का रास्ता,
वही काॅलेज बन गये, हमारी विफलता की दास्तां।
-------------- क्या ऐसी ही सोच में हम जी रहे हैं?

ए फॉर एपल बी फॉर बाल

मुशिकिल में हो गया मेरा हाल,
रटते-रटते हम गये हार।
अ से अनार आ से आम,
देते हे टीचर हर दम काम।
किसने बनाई ये विज्ञान,
जिसने ली है हमारी जान।
याद करो, याद करो,
दिन भर रटकर तोते बनो।
स्कूल जाओ, स्कूल जाओ,
बिना जुर्म के सजा पाओ।
कोई तो सुपर मेन आये,
हमको इनसे मुक्ति दिलाये।
पेरेंट्स अपने को समझे सेठ,
महँगी से महँगी ढूँढे जेल।
पढ़ाई लिखाई समझ में न आती,
हमको ये करनी क्यों है पड़ती?
बताओं!
---------बताओं!
-----------------बताओं!
किन्तु हमारे पास बच्चों के इन सवालों के जवाब नहीं होते हैं।

अध्याय - 1 शिक्षा

शिक्षा का अर्थ- शिक्षा का अर्थ ‘सीखना’ होता है।
पुस्तकें ग्रहण करने से या पुस्तकें पढ़ने से हम सीख जायेगें यह पूरी तरह नहीं कहा जा सकता।
किसी बच्चे ने जो अभी-अभी हिन्दी पढ़ना सीखा है उसे कोई कहानी पढ़ा दे, तो क्या उसके पढ़ने के बाद उस कहानी से जो शिक्षा मिल रही है, क्या वह उस तक पहुँच पायेगा? नहीं।
क्योंकि पुस्तकें सीखने का माध्यम तो हो सकती हैं, लेकिन पुस्तके शिक्षा नहीं, जैसे मोटरसाइकिल बाजार जाने का माध्यम तो हो सकती है, लेकिन बाजार नहीं।
शिक्षा की परिभाषा बडे़-बडे़ विद्वानों ने शिक्षा की बड़ी-बड़ी परिभाषाऐं दी है।
महात्मा गाँधी-‘‘शिक्षा से मेरा तात्पर्य बालक तथा व्यक्ति के शरीर, मन तथा आत्मा का सर्वोत्तम विकास करना है।’’
स्वामी विवेकानंद-‘‘मानव की अन्तर्निहित पूर्णता की अभिव्यक्ति ही शिक्षा है।’’
उपनिशद्-‘‘सा विद्या या विमुक्तये’’
आत्मोपासन बल से जीवन में शिघ्र ही उस मेधा का प्राकट्य होना चाहिए, जो यह समझा दे कि विद्या क्या है? अविद्या क्या है? विद्या का आश्रय मनुष्य को पूर्ण मुक्त बनाकर जीवन को दर्शन में परिवर्तित कर देता है।
- श्री हेमन्तभारद्वाज शास्त्री
फ्राबेल-‘‘शिक्षा के माध्यम से बालक अपनी अंतर्निहित पक्तियों को सामने लाता है।’’
लेकिन वर्तमान युग में शिक्षा की परिभाषा -
‘‘शिक्षा मतलब नौकरी’’
एक बार रात्रि के समय मैं अपने मित्र के यहाँ पर किसी काम से गया था। वहाँ मेरी नजर उसके पुत्र पर गयी जो कि पढ़ रहा था। मेरे मुँह से एक दम निकल गया। अरे बेटा! सोये नहीं , अभी तक पढ़ रहे हो। उसके पुत्र ने तुरंत जवाब दिया ‘सो जाऊँगा तो बढ़िया परसेंट कैसे बनेगी’।
मित्र आया, हैलो! हाय! हुआ। लेकिन मेरे मन में उसके पुत्र का जवाब घूम रहा था। अतः मैंने मेरे मित्र से कहा तुम्हारा पुत्र बड़ा होशियार है, देर रात्रि तक पढ़ता रहता है।
मित्र ने जवाब दिया देर रात तक नहीं पढे़गा तो डाक्टर कैसे बनेगा? फिर में कुछ नहीं बोला और अपना काम होने पर लौट आया।
ये तो वही हुआ जैसे एक तोता आसमान की ऊँचाईयों को छू सकता है, किन्तु उसे किसी पिंजरे में रख दिया जाये तो बस वह उस पिंजरे में फड़फड़ा सकता है।
ठीक उसी तरह आज शिक्षा को एक पिंजरे में कैद कर दिया। जो तोते को रखने के लिए सब अपनी-अपनी पसंद के छोटे-बडे़, आकार के अनुसार कई प्रकार के पिंजरे लाते हैं। वैसे ही आज,डॉक्टर इंजीनियर, नौकरी आदि कहीं तरह के पिंजरांे में शिक्षा को कैद कर दिया, और उस पिंजरे में शिक्षा छटपटा रही है जैसे नदी का पानी, बहते रहने के कारण कभी बदबुदार नहीं होता, लेकिन किसी सीमित पात्र में रखा हुआ पानी दुर्गन्ध युक्त हो जाता है।
जहाँ शिक्षा एक अखंड़, नित्य-निंरतर, सुगंध षी
शिल है। वहीं आज उसी शिक्षा से दुर्गंध आ रही है।
शिक्षा के लक्षण- ईमानदारी, शांति, सद्गुण, सन्तुश्टता संतुष्टता, सम्मान, अहिंसा, सत्य, सुसंस्कार, आत्मविश्वास आदि।
अशिक्षा के लक्षण- बेईमानी, अशांति, दुर्गुण, असंतुष्टता, अपमान, हिंसा, असत्य, कुसंस्कार, आत्मघात आदि।
शिक्षा के स्त्रोत- सीखने का कार्य इस ब्रह्माण्ड में घटित होने वाली सभी घटनाऐं, परिस्थितियों, वस्तुओं, सजीवों, निर्जिवों से किसी न किसी रूप में चलता ही रहता है।
जिस तरह न्यूज पेपर में खबरें, सभी प्रकार के व्यक्तियों की उपयोगिता को ध्यान में रखते हुए प्रस्तुत की जाती है। विद्यार्थियों के लिए प्रशन, बच्चों के लिए कविता, पहेली या रोचक जानकारियाँ, महिलाओं के लिए व्यंजन या साज-सज्जा, व्यापारियों के लिए वस्तुओं के भाव और उसी के अनुरूप सब पढ़ते भी हैं। वैसे ही प्राणी अपने-अपने काम या उपयोगिता की बातांऐ को इस ब्रह्माण्ड से ग्रहण करते हैं।
शिक्षा का महत्त्व-शिक्षा से ही जीवन है, जैसे मछली बिना पानी के जीवित नहीं रह सकती है, वैसे ही आपका जीवन भी शिक्षा के बिना संभव नहीं है। जिस तरह मछली को जल सेअलग नहीं किया जा सकता, उसी तरह जीवन को शिक्षा से अलग कर पाना संभव नहीं है, क्योंकि शिक्षा से ही जहर व अमृत तथा आग और पानी का अंतर व महत्ता समझ में आती है।

अध्याय - 2 गुरू

अर्थ- सीखाने वाला गुर या गुण (पैदा करने) सीखाने वाला।
परिभाषा- 2+2 बराबर 4 होता है, अर्थात् यह बात सत्य है। अतः इसे ज्ञान कह सकते हैं। लेकिन 2+2 बराबर 5 होता है, यह असत्य है। जो ऐसा कह रहा है, या मानता है, तो हम कहेंगें कि यह असत्य है तथा जो ऐसा मानता है, वो अज्ञान में है, या अंधकार में है, अर्थात् जो २+2 बराबर 4 मानता है या बताता है। वही प्रकाश में है।
तात्पर्य गुरू ही ज्ञान है, ज्ञान ही सत्य है, सत्य ही प्रकाश है, और प्रकाश ही ईश्वर है,ऐसा सभी धर्म मानते हैं।
निष्कर्ष- ज्ञान, सत्य, प्रकाष, ईश्वर ये सभी शब्द गुरू के ही पर्यायवाची है या गुरू के बिना इन सब शब्दों का कोई मोल या औचित्य नहीं है।
इसलिए कहा गया है-
गुरूब्र्रह्मा गुरूर्विष्णु गुरूर्देवो महेश्वरः।
गुरूःसाक्षात्परब्रह्म तस्मै श्रीगुरूवे नमः।।
अर्थात् जो आपके जीवन के अज्ञान या असत्य या अंधकार या अईश्वरीय भाव को मिटाकर आपके जीवन में ज्ञान या सत्य या प्रकाश को उजागर कर दे, वही गुरू है।
पहचान- अगर कोई नदी है, तो वह नदी क्या है? खाली खाँचा-नुमा बना हुआ (जिसमें पानी न हो) या उसमें बहतापानी या उसमें पड़े कंकरीट, पत्थर या उसमें बहती हुई आई अन्य सामग्री। अगर कोई कहे पानी नदी है, तो पानी गिलास में भी है, उसे हमने नदी नहीं कहा। उसी तरह का ऐसा कोई खाँचा बना दिया तो उसे भी नदी नहीं कहा जाता है, बल्कि फिर उसे खाळ का नाम दिया जाता है।
अर्थात् नदी वह है कि ऐसा पानी जो अपनी मर्यादा के अन्दर नित्य-निरंतर शांत-चित्त भाव से सब कुछ अपने में ग्रहण करती है तथा निस्वार्थ भाव से सभी का पोषण करती हुई बहती रहती है।
उसी तरह सूर्य पूरे जग को प्रकाषित करता है तथा बिना किसी भेदभाव (निस्वार्थ भाव) से अपनी किरणों को सभी के आँगन में फैलाता है। चंद्रमा भी अपनी शीतलता को निस्वार्थ भाव से फैलाता है।
इसी तरह किसी गुरू में गुरू का शरीर गुरू नहीं है, जैसे की खाळ को नदी नहीं कह सकते हैं अर्थात् जिस शरीर में निस्वार्थ भाव से पोषण करने वाला तत्त्वज्ञान है, वही गुरू है।
इसलिए कहा गया है कि गुरू बिना ज्ञान संभव नहीं है न कि यह कहा गया है कि पुस्तक बिना ज्ञान संभव नहीं या पढ़े बिना ज्ञान संभव नहीं है।
हम गुरू का आँकलन उसकी गरीबी/ अमीरी या पहनावें या खानपान या चाल-चलन से देखने की कोशिश करते हैं। लेकिन यह सब ऊपरी दिखावा है, जिसे कोई भी कर सकता है। जबकि देखना है कि अंदर क्या है? ठीक वैसे ही जैसे बाजारमें किसी दुकान पर लटके प्लास्टिक के अंगूर के फल देखने या सजाने के काम में तो लिए जा सकते है, लेकिन खाकर पेट नहीं भरा जा सकता।
वैसे ही जिस गुरू में ज्ञान नहीं है, वह मात्र उस कलम की तरह है। जिसमें स्याही न हो, अर्थात् उसे जेब में तो रख सकते है, लेकिन लिखा कुछ नहीं जा सकता।
नोट- एकलव्य ने मात्र गुरू द्रोणाचार्य की एक पत्थर की मूर्ति बनाकर ही अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा ग्रहण कर ली थी। लेकिन वहाँ एकलव्य की अपने गुरू के प्रति सत्य निश्ठा ने कार्य किया। यदि मन में सत्य निष्ठा हो तो कंकर भी हो शंकर हो सकता है।

अध्याय - 2 शिष्य

शिष्य का अर्थ- सीखने वाला न की पढ़ने वाला या रटने वाला अर्थात् शिष्य वही है, जो सीखता है, या अपने अंदर सीखने का गुण रखता है।
शिष्य का स्थान या पद-
प्रश्न- पुत्र, शिष्य, भक्त इन तीनो में क्या बनना सबसे सरल होता है?
उत्तर- शिष्य बनना सरल है। अच्छा शिष्य बन जाने पर अच्छा पुत्र और अच्छा भक्त स्वतः ही बन जाता है।
प्रश्न - पुत्र, शिष्य, भक्त इन तीनों में से सबसे बड़ा पद किसका है? v उत्तर- शिष्य ।
आजकल हर व्यक्ति कोई भी पद को प्राप्त करने की इच्छा रखता है या सभी पदो को अधिक महत्त्व देता है। लेकिन सबसे बड़ा या ऊँचा पद यदि कोई है, तो वह शिष्य का है।
जैसे भगवान् से बड़ा कोई पद है, तो वह सेवक या भक्त का माना जाता है क्योंकि भगवान् को भक्त के अधीन माना जाता है। ठीक इसी तरह गुरू को भी साक्षात् शिव कहा है।
गुरूब्र्रह्मा गुरूर्विष्णु गुरूर्देवो महेश्वरः।
गुरूःसाक्षात्परब्रह्म तस्मै श्रीगुरूवे नमः।।
अतः गुरू से बड़ा पद शिष्य का हुआ। जिस तरह भक्त के बिना भगवान् अधूरा है। उसी तरह शिष्य के बिना गुरू भी अधूरा होता है।
शिष्य के गुण- जिज्ञासु, कर्मठ, परिश्रमी, धैर्यवान, आज्ञाकारी, अनुशासित, सत्यवादी, स्वाभिमानी आदि।
अच्छा शिष्य बनने में बाधक तत्त्व- संसार का प्रत्येक प्राणी अपने को दूसरे व्यक्ति की अपेक्षा अधिक ज्ञानवान मानता है।
शिष्य की पहचान- अच्छे शिष्य वही है जो कुम्हार द्वारा बनाये गये मटके के समान है।
1.कोरा हो (खाली)
2.अपना एक सुनिश्चित आकार (नीचे से सकड़ा, बीच में चैड़ा, ऊपर से सकड़ा)
3.कहीं से छिद्र या टूटा न हो (क्योंकि जिसमें छिद्र होगा उसे आजीवन भरते रहने में भी सार नहीं है।)
4.जिसमें जल्द ही पानी को ठण्ड़ा करने की पूरी क्षमता हो (जो भी ज्ञान दिया जाये उसे पचाने की प्रक्रिया स्वतः हो)
5.जो कि बिना किसी आधार के नहीं टिके।
शिष्य के प्रमुख दोष- अपने को ज्ञानवान मानना।
एक छोटा बालक या आपका बच्चा भी आप से यह कह देता है कि पापा/भैया आपको कुछ नहीं आता या आपको इतना भी पता नहीं है।
अर्थात् एक छोटा बच्चा भी आपकी बात को गलत साबित कर अपने पक्ष को रखकर स्वयं को आपसे अधिकसमझदार समझता है।
जो अपने को जब तक समझदार या ज्ञानवान समझ रहा है, तब तक वह अच्छा शिष्य नहीं हो सकता।
श्रेष्ट शिष्य बनने के उपाय-
1.किसी भी भरे हुऐ कागज पर कुछ लिखना संभव नहीं है। यदि लिख भी दिया तो उसे पढ़ नहीं सकते।
अर्थात् अच्छा बनने के लिए अपने को कोरे कागज के समान बनायें।
2.जो पात्र पहले से ही भरा हुआ हो उसमें कुछ डालने से तात्पर्य नहीं है या भरे हुये पात्र में एक बूंद भी डालेगें तो वह बाहर निकल जायेगी।
अर्थात् अपने को पहले खाली करें, क्योंकि सक्षम गुरू की शरण में रहकर भी तुम्हारे अंदर किसी प्रकार का बदलाव संभव नहीं हो पायेगा।
3.बंजर जमीन पर कितना ही उत्तम किस्म का बीज बो दीजिए वह अंकुरित नहीं होगा।
अर्थात् अपनी बंजर जैसी बुद्धि को उपजाऊ (स्वच्छ) बनायें।
4.कंकरीट मिट्टी से कभी मटका नहीं बनाया जा सकता।
अर्थात् बुद्धि की कंकरीटता को हटायें।
5.जिज्ञासु बने।
अर्जुन के अन्दर भी सभी अन्य शिष्यो की अपेक्षा तीव्र जिज्ञासा थी अर्थात् जिसमें जिज्ञासा तीव्र गति की होगी वही सर्वश्श्रेष्ट शिष्य भी होगा।
6.अपनी आँखों की बजाय गुरू की आँखों से देखें या हमारी आँखें हमेषा लक्ष्य पर केन्द्रित रखें।
एक बार द्रोणाचार्य ने अपने शिष्यो की परीक्षा लेनी चाही। उन्होनें कारीगर से एक नकली गिद्ध बनवाया और उसे कुमारों से छिपाकर एक वृक्ष पर टांग दिया। तदनन्तर राजकुमारों से कहा धनुष पर बाण चढ़ाकर तैयार हो जाओ। तुम्हें निशाना लगाकर उस गिद्ध का सिर उड़ाना होगा। उन्होनें पहले यूधिष्ठिर को आज्ञा दी पूछा कि ‘‘यूधिष्ठिर! क्या तुम इस वृक्ष को मुझे और अपने भाईयों को भी देख रहे हो?’’ यूधिष्ठिर बोले, ‘‘जी हाँ, मैं इस वृक्ष को, आपको और अपने भाईयों को भी देख रहा हूँ। ‘‘द्रोणाचार्य ने कुछ खींझकर झिड़कते हुए कहा, हट जाओ, तुम यह निशाना नहीं लगा सकते। इसके बाद उन्होंने दुर्योधन आदि राजकुमारों को एक-एक करके वहाँ खड़ा कराया और यही प्रश्न किया। उन सबने वही उत्तर दिया, जो यूधिष्ठिर ने दिया था। आचार्य ने सबको झिड़क कर वहाँ से हटा दिया।
अन्त में अर्जुन को बुलाकर उन्होंने कहा, ‘‘देखो निशाने की ओर चूकना मत।’’ धनुष चढ़ाकर मेरी आज्ञा की बाट जोहो। क्षणभर ठहरकर आचार्य ने पूछा, ‘‘क्या तुम्हें इस वृक्ष पर गिद्ध के अतिरिक्त और कुछ नहीं दिखाई दे रहा हैं।’’ द्रोणाचार्य नेपूछा, ‘‘अर्जुन! भला बताओ तो, गिद्ध की आकृति कैसी है?’’ अर्जुन बोले, ‘‘भगवन्! मैं तो केवल उसका सिर ही देख रहा हूँ। आकृति का पता नहीं। द्रोणाचार्य का रोम-रोम आनन्द की बाढ़ से पुलकित हो गया। वे बोले, ‘‘बेटा! बाण चलाओ।’’ अर्जुन ने तत्काल बाण से गिद्ध का सिर काट गिराया।
7.स्वयं को एक शिष्य ही माने या बनायें।
अर्जुन गुरू द्रोणाचार्य का सर्वश्श्रेष्ट शिष्य था। महाभारत में अर्जुन से सम्बन्धित प्रकरण में यह ध्यान देने योग्य बात है कि जब तक अर्जुन अपनी माता या परिवार के साथ रहे तब तक उन्होनें अपना परिचय कौन्तेय दिया। लेकिन जब से वह गुरू द्रोणाचार्य के शिष्य बने तब से लेकर शिक्षा पूर्ण होने तक उन्होनें अपना एक मात्र परिचय ‘‘गुरूद्रोण शिष्य के नाम से दिया। परिचय देने से यह तात्पर्य है कि जब तक वह शिष्य के रूप में रहे तब तक या शिक्षा ग्रहण की तब तक उन्होनें अपने को मात्र एक शिष्य ही माना न कि मैं क्या हूँ? क्या नहीं? क्या करना है? क्या नहीं करना है? मेरी क्या इच्छाएँ या अनेच्छाएँ हैं? आदि। मात्र उनका एक ही उद्देश्य था कि मैं शिष्य हूँ, और मुझे शिक्षा ही ग्रहण करनी है। गुरू आज्ञा से बढ़ कर या अपने इस शैक्षिक जीवन काल में कुछ भी नहीं है।
8.गुरू से सीखने के बजाय गुरू को ग्रहण करें।
प्रश्न-अगर हमें ठण्ड़क को प्राप्त करना है तो ठण्डे पानी के गिलास को अँगुली से छुये या उसे अपने हाथ में पकड़ें किससे ज्यादा ठण्डक प्राप्त होगी?
उत्तर-उसे अपने हाथ में पकड़े। लेकिन हाथ में भी कब तक पकड़े रहेगें पानी ही गर्म हो जायेगा। किन्तु उस पानी को पी लिया जाये तो शायद ठण्ड़क को अधिक व शिघ्र प्राप्त कर सकते है।
अर्थात् गुरू के साथ अपने संबंध को द्वेत की बजाय अद्वेत माने या बनाने का प्रयास करें।
9.गुरू के प्रति त्याग की भावना का विकास करें तथा गुरू आज्ञा को ही सर्वोपरि मानें।
एक बार सभी राजकुमार आचार्य की अनुमति से शिकार खेलने के लिये वन में गये। राजकुमारों का सामान और एक कुत्ता साथ लिये एक अनुचर भी वन में चल रहा था। वह कुत्ता घूमता फिरता वहाँ पहुँच गया जहाँ एकलव्य धनुर्विद्या का अभ्यास कर रहा था। एकलव्य का शरीर मैला-कुचैला था। वह काली मृगचर्म पहने था और उसके सिर पर जटाऐं थी। कुत्ता उसे देखकर भौंकनेे लगा। एकलव्य ने खींझकर सात बाण मारे, जिससे उस कुत्ते का मुँह भर गया। परंतु उसे कहीं पर भी चोंट नहीं लगी। कुत्ता बाण भरे मुँह से पाण्डवों के पास आया। यह आशष्चर्यजनक दृष्य देखकर पाण्डव कहने लगे कि उसका शब्द वेध और फुर्ती तो विलक्षण है। टोह लगाने पर उसी वन में उन्हें एकलव्य मिल गया। वह लगातार धनुर्विद्या का अभ्यास कर रहा था। पाण्डव एकलव्य का रूप बदल जाने के कारणउसे पहचान न सके। पूछने पर एकलव्य ने बतलाया मेरा नाम एकलव्य है। मैं भीलराज हिरण्यधनु का पुत्र और द्रोणाचार्य का शिष्य हूँ। मैं यहाँ धनुर्विद्या का अभ्यास करता हूँ। अब सभी ने उसे अच्छी तरह पहचान लिया। वहाँ से लौटकर सब राजकुमारों ने द्रोणाचार्य से सब हाल कह सुनाया। अर्जुन ने कहा गुरूदेव! आपने मुझे हृदय से लगाकर बडे़ प्रेम से यह बात कही थी कि मेरा कोई भी शिष्य तुमसे बढ़कर न होगा। परंतु यह आपका शिष्य एकलव्य तो सबसे और मुझसे भी बढ़कर है। अर्जुन की बात सुनकर द्रोणाचार्य ने थोड़ी देर तक कुछ विचार किया और फिर उन्हें साथ लेकर उसी वन में गये।
द्रोणाचार्य ने अर्जुन के साथ वहाँ पहुँचकर देखा कि जटा वल्कल धारण किये एकलव्य बाण पर बाण चला रहा है। षरीर पर मैल जम गया है परंतु उसे इस बात का ध्यान नहीं है। आचार्य को देखकर एकलव्य उनके पास आया और चरणों में दण्डवत प्रणाम किया। फिर वह उनकी विधिपूर्वक पूजा करके हाथ जोड़कर उनके सामने खड़ा हो गया और बोला आपका शिष्य सेवा में उपस्थित है। आज्ञा कीजिये। द्रोणाचार्य ने कहा यदि तू सचमुच मेरा शिष्य है, तो मुझे गुरूदक्षिणा दे। एकलव्य को बड़ी प्रसन्नता हुई। उसने कहा आज्ञा कीजिये। मेरे पास ऐसी कोई वस्तु नहीं, जो मैं आपको न दे सकूं। द्रोणाचार्य ने कहा एकलव्य! तुम अपने दाहिने हाथ का अंगूठा मुझे दे दो। सत्यवादी एकलव्य अपनी प्रतिज्ञा पर डटा रहा और उसने उत्साह तथा प्रसन्नता से दाहिने हाथ का अंगूठा काटकर गुरूदेव कोसौंप दिया।
10.सेवा व सम्मान के द्वारा गुरू की कृपा प्राप्त करें।
11.श्रेश्ठ शिष्यों की जीवनियाँ पढ़े।
अगर आपको श्रेष्ट शिष्य बनना है, तो श्रेष्ट शिष्यों की छवि को अपने सामने रखें तथा जिन-जिन शिष्यों की जीवनियाँ आप पढ़-सकते हैं, उन्हंे पढे़ं। कुछ श्रेष्ट शिष्यों के दृश्टांत निम्न है ।

अध्याय -4 शिष्य का जीवन काल

4.1- गर्भावस्था
4.2-बाल्यवस्था (कच्ची मिट्टी)
4.3-स्कूल लाइफ
प्राथमिक अवस्था (चाक पर रखकर घूमाना प्रारम्भ करना)
उच्च प्राथमिक अवस्था (घूमते हुये चाक पर मिट्टी को आकार देना)
माध्यमिक अवस्था (सूखने के लिए रखना)
उच्च माध्यमिक अवस्था (पकाने के काबिल है या नहीं यह निर्णय लेना)
4.4- काॅलेज लाइफ (अग्नि में पकाना)

4.1- गर्भावस्था

सर्वश्रेष्ठ शिष्य अर्जुन पुत्र अभिमन्यु ने चक्रव्यूह भेदन की शिक्षा अपनी माँ के गर्भ में ही ग्रहण कर ली थी।
क्या आप सहमत है कि बच्चा सीखने का कार्य अपने गर्भावस्था के समय से करने लग जाता है?
1.यदि सहमत नहीं है तोः- यदि आपको कहीं घूमने जाना है और आप 100 रूपये का पेट्रोल बाइक में डलवाते हैं, और रास्ते में आपकी गाड़ी बंद हो जाती है, तो क्या गाड़ी को मैकेनिक के पास तक पैदल ले जायेंगें? नहीं। आप गाड़ी को पहले मैकेनिक की दुकान तक नहीं ले जायेंगें। किंतु पहले आप वह सब कार्य करेगें जितना आप जानते हंै, तथा उन सब क्रिया-कलापों में आप पेट्रोल भी चेक करेंगे ही, चाहे आप कितना ही पेट्रोल भरवाकर निकले थे।
जब भी आप बीमार होते हैं, तो डॉक्टर के पास जाते हंै, तब डॉक्टर क्या करता है? वह आपको सब तरह की गोलियाँ देगा क्योंकि उसे लक्ष्य तक पहुँचना है।
कोई भी इलेक्ट्रोनिक आइटम अगर खराब होता है, तब मैकेनिक भी यही करता है कि शुरू से अंत तक चेक करना प्रारम्भ करेगा। जिस फाल्ट के होने की संभावना नहीं होती उसे भी एक बार तो चेक करके देखता ही है।
2.यदि सहमत है तोः-
जब स्त्री गर्भावस्था को प्राप्त करती है, तब माता-पिता का सारा ध्यान इस ओर होता है कि लड़का होगा या लड़की और लड़का ही हो इसलिए अथक प्रयास प्रारम्भ होते है। लड़के के लिए डॉक्टर से लेकर देवी-देवताओं तक ढ़ोकना प्रारम्भ हो जाता है तथा कई तरह के पूजा-पाठ, कर्म-काण्ड प्रारम्भ हो जाते हैं। लड़के की प्राप्ति के लिए इतना तक करना भी चल सकता है। किंतु यह पता लगा कर की लड़की होगी या लड़का और लड़की होने का पता लगने पर होने से पहले ही या होने के बाद उसकी हत्या तक करने के लिए तैयार हो जाना, यह बड़ी गंभीर समस्या है।
और सभी इसी दौड़ में भाग लेते रहे तो आगे का भविष्य क्या होगा या कैसा होगा कभी सोचा? और अब तक नहीं सोचा तो अब,
सोच
कर
देखें।
मध्यकालीन युग तक भी राजा, धनी, रियासत व जमींदार जैसे व्यक्तियों में एक से अधिक पत्नियाँ रखने का प्रचलन था। वर्तमान युग में व्यक्ति एक से अधिक पत्नि नहीं रख सकता है, न व्यक्तिगत रूप से न कानूनी रूप से। यदि भविष्य में दो व्यक्तियों को मिलकर एक स्त्री से विवाह करना पड़ा तो वह समाज कैसा होगा? आपने अब तक नहीं सोचा।
लेकिन अब जरूर सोचे।
कन्या बचाओ।
संकल्प उठाओ।
यदि आप होनहार, कुषाग्र, बुद्धिमान, विवेकशील संतान चाहते हैं, तो उसकी गर्भ के समय से ही उन सब छोटी-छोटी बातों पर ध्यान दें जो उसके बुद्धिमान बनने में सहायक हो सकती है।
1.चिकित्सा
2.जातक कर्म
3.वातावरण
4.सन्तुलित आहार-विहार
5.नित्य-कर्म
1.चिकित्सा- समय≤ पर चिकित्सक से मिले उचित चेकअप करवायें तथा चिकित्सक द्वारा दिये गये सभी निर्देषों, परामर्षो तथा उसके द्वारा दी गई सभी औशधियों का नियमित रूप से सेवन करें, सभी टीके इत्यादि समय पर लगवायें। यदि टीकों का उचित समय ध्यान नहीं रहता है, तो उसका चार्ट एक दीवार पर चिपका कर रखें।
2.जातक कर्म- अपने-अपने धर्मानुसार जितने भीजातक कर्म हो उन्हें करवायें।
जैसे हिन्दू धर्म में मनुष्य के 16 संस्कारों का वर्णन किया गया है।
3.वातावरण- गर्भावस्था में स्त्री को अनुचित वातावरण का सेवन नहीं करना चाहिए, जैसे अधिक शोरगुल, भीड़-भाड़, बदबुदार स्थानों, अत्यधिक गर्म या अत्यधिक ठण्डे स्थानों का आदि। प्राकृतिक स्थानों व हरियाली आदि उचित स्थानों पर जाये यदि कहीं घूमने जाते हैं तो।
4.आहार- अपने मन को अच्छा लगने वाला या अपने स्वादानुसार भोजन की उपेक्षा करें, तथा अपने शरीर व बच्चे के लिए जो भोजन हितकारी हो उसी का सेवन करें। जैसे-हरी सब्जियाँ, फल, सलाद आदि।
5.विहार- सुबह नियमित रूप से जल्दी उठे, जल्दी षयन करें। सुसंग, दूसरों से सुव्यवहार रखें, अत्यधिक वाचाल होने से बचें, दुसरो की चुगली, निंदा नहीं करे, टी. वी./कम्प्यूटर इत्यादि पर आक्रामक, डरावने प्रोग्राम या फिल्में नहीं देखें।
6.नित्य कर्म-अधिक से अधिक जप, तप, साधना, मंत्र उच्चारण, भजन, संध्या, स्वाध्याय (रामायण, महाभारत, गीता, कुरान, बाइबिल आदि धार्मिक ग्रंथों, महापुरुषो की जीवनियाँ आदि का पठन करें) आदि सहजता से जितना हो सकता है, उतना करने की कोशिश करें।

4.2-बाल्यवस्था (कच्ची मिट्टी)

(स्कूल से पूर्व/ कच्ची मिट्टी)

‘‘बच्चे कच्ची मिट्टी के समान होते हैं, उन्हें जैसा आकार देते हैं उसी रूप में बदल जाते हैं।’’
जैसे ही यह लाइन आपको किसी से सुनने या पढ़ने को मिलती है तो शीघ्र ही आप बात को समझ जाते है, और इस गोली को अपनी बन्दूक में भरकर सीधे आप अपने घर पर जाते है, और सीधे अपने बच्चों पर चलाना प्रारम्भ कर देते हैं।
जैसा भी आप अपने बच्चे को बनाने की अपेक्षा रखते है, जैसे लखपती, करोड़पती, डाॅक्टर, इंजीनियर, बिजनेस मैन, मैरिट या उच्च प्रतिषत आदि शब्दों के तीर बच्चे पर चलाना प्रारम्भ कर देते हैं।
किसी व्यक्ति को तीर चलाना या बन्दूक चलाना नहीं आता हो और वह व्यक्ति चलाये तो क्या होगा?
यही होगा कि तीर/गोली निशाना चूक जायेगी या गलत जगह पर लग जायेगी और गलत जगह लग गई तो ...
आपका मात्र एक सपना तो पूरा होने से रहा, लेकिन साथ ही आपकी कई छोटी-मोटी अपेक्षाएँ जो अपने बच्चों से होती हैं, वो भी दूर-दूर तक पूरी नहीं होगी तथा कई नई परेशानियाँ उत्पन्न हो जायेगी।
जिस तरह किसी भी कार्य को करने से पहले उस कार्य को सीखना पड़ता है। उसी तरह किसी से कुछ कहने से पहले यह जरूरी है, कि जो भी हम कह रहें हैं । उसे पहले खुद समझे फिर दूसरे से बोले।
-------------पहले तौलो फिर बोलो,
बन्दूक से निकली गोली,
कमान से निकला तीर,
----- जबान से निकले शब्द,
------ वापस नहीं आते।
‘‘बच्चे कच्ची मिट्टी के समान होते हैं, उन्हें जैसा आकार देते हैं, वह उसमें बदल जाते हैं।’’
इस कथन का अर्थ हम निम्न प्रकार से समझ सकते हैं -
इस कथन में जितने भी शब्द आये हैं पहले उन शब्दों के अर्थ को समझें।
1.बच्चे-इस कथन में बच्चे शब्द से तात्पर्य है कि यह कथन मात्र बच्चों पर लागू होता है न कि बड़ों पर।
उदा.-बड़ों से तात्पर्य जिनकी उम्र 15-16 वर्श को पार कर गई, अर्थात् वह बर्तन जो कि अपना आकर ले चुका है, जैसे- घड़ा, सुराई या मिट्टी का कोई खिलौना आदि।
यदि इस कथन को बड़ों पर प्रयोग किया जाये तो बात बिगड़ जायेगी। कहने का तात्पर्य यह है कि जो आकार ले चुका है, उस पर प्रयोग किया गया तो परिणाम यह होगा कि उसका आकार या स्वरूप बिगड़ जायेगा अथवा नष्ट हो जायेगा।
2.कच्ची मिट्टी- आकार सिर्फ कच्ची मिट्टी को दिया जा सकता है न कि पक्की या कठोर मिट्टी को यदि मिट्टी पक्की हो तो पहले उसे कच्ची बनाने का प्रबन्ध करें और हर पक्की मिट्टी को कच्ची बनाना संभव नहीं होता है, यह भी ध्यान रखें।
3.समान- बच्चा कच्ची मिट्टी के समान है, लेकिन कच्ची मिट्टी नहीं है। कच्ची मिट्टी को बार-बार गीला करके प्रयोग में लिया जा सकता है, किंतु बच्चे को नहीं, अगर मिट्टी खराब हो भी जाये तो मिट्टी दूसरी मिल जायेगी, मगर बच्चा दूसरा नहीं मिलगा
4.आकार- जब कुम्हार कच्ची मिट्टी को चाक पर रखकर घूमाता है, तो घूमाने से पूर्व यह निर्धारित करता है, कि उसे बनाना क्या है?
5.बदलना- कच्ची मिट्टी को जब कोई आकार दे दिया गया तथा उसे पका दिया तो फिर उसके आकार में किसी प्रकार का बदलाव करना संभव नहीं है इसलिए बच्चा कच्ची मिट्टी के समान तो है, मगर कच्ची मिट्टी नहीं है।
अतः किसी भी कथन को सुनने के बाद उसे अपने जीवन में उतारने या दूसरे से कहने से पूर्व उसे समझना अतिआवश्यक है।
जब आपने इस कथन को सुना तब आपके दिमाग में आया कि हम एक बार तो किसी कुम्हार के पास जाकर यह देखें कि वह किस प्रकार से कच्ची मिट्टी को किसी आकार में बदलता है या किसी पुस्तक में पढें कि कुम्हार कैसे मटका बनाता है? या इंटरनेट पर मटका बनाने की विडियो देखी हो! शायद देखते या उस कुम्हार से बनाने के बारे में पूछते तो शायद यह जितना मुझे समझ में आया उससे भी कई ज्यादा आप समझ पाते।
मैनें कभी मटका नहीं बनाया किंतु बनाते हुये देखा जरूर है। उसी आधार पर आपके लिए लिखने की कोशिश कर रहा हूँ, जो कि निम्न प्रकार है-
कुम्हार सबसे पहले उस मिट्टी को लाता है जो अधिक चिकनी और कम बरबरी हो। फिर उस मिट्टी को छानता है तथा उसमें पानी डाल कर, गल जाने के बाद उसे गूंधता है। गूंधने के बाद आवश्यकतानुसार गोला बनाता है। फिर उसे चाक के ऊपर रखकर चाक को तेज घूमाता है और मिट्टी के गोले को अपने दोनों हाथों के बीच में रखता है। इच्छानुसार अपने दोनों हाथों से उसे आकार देता जाता है। इच्छानुसार आकार बनाने पर उसे चाक पर से उतार कर सूखाने के लिए रखता है और सूखने के बाद उसे पकाता है।
‘‘बच्चे कच्ची मिट्टी के समान होते हैं उन्हें जैसा आकार देते हैं उसमें ढल जाते हैं।’’
उपरोक्त कथन का सम्पूर्ण अर्थः-
मटके बनाने की प्रक्रिया में कई बातें छिपी है। उसी बच्चे को किसी भी आकार में बदला जा सकता है, जो चिकनी मिट्टी की तरह हो न की बरबरी मिट्टी जैसा हो, तथा फिर उस मिट्टी को छानना पड़ेगा, अर्थात् पहले बच्चे से बात करो उसे जानने की कोशिश करो उसकी प्रकृति कैसी है? वो क्या चाहता है? क्या नहीं? और बच्चे को जानने के लिए जरूरी है कि पहले वह बोले और बोलेगा तो तब जब आप उसके साथ दोस्ती करेगे। आप उसे टॉफी खिलाने जैसे कार्य करें। फिर उसे थोड़ा समय दे या अगली बार आपको उसे जैसा आकार देना है। उसी के अनुरूप उसके सामने कार्य करें। कार्य कौनसा शब्दों के तीर चलाना नहीं बल्कि जिस तरह कुम्हार अपने हाथों को घूमाता है। कुम्हार हाथों को वैसे-वैसे घूमाता है, जैसा उसे आकार देना होता है, न कि उस मिट्टी से बोलता है, कि तुम इस तरह का बन जाओ क्योंकि मिट्टी सुनती नहीं है।
उसी तरह आप बच्चों से बोलोगे तो सुनेंगे नहीं यदि सुन भी लिया तो उनकी स्मृति एवं दूरदर्शिता इतनी परिपक्व नहीं होती कि उनको याद रहे। यधपि बच्चों से बोलें नहीं कि ऐसा करें, वैसा करें। बल्कि उनके सामने, स्वयं वह कार्य करें जैसा हम उन्हें सीखाना चाहते हैं।
अतः आपके बच्चे की यह अवस्था कुम्हार की कच्ची मिट्टी के समान है, अतः जिस तरह कुम्हार कच्ची मिट्टी को जितना बढ़िया बनाता है, मटका भी उतना ही बढ़िया बनता है। तथा पानी भी अधिक ठण्ड़ा होता है। उसी तरह आप इस अवस्थामें जितना ध्यान देंगे, उतना ही आपके बच्चे की मानसिक व शारीरिक स्थिति अच्छी बनेगी।
प्रश्न-बालक को विद्यालय से पूर्व क्या सीखायें?
उत्तर-अपने बालक की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए निम्न बातों पर ध्यान देंवे-
1. पहले पढ़ाई की बातें न सीखायें-
प्रश्न -नई-नई मूवी लगी हो, आप उसे देखने जाना चाहते है, लेकिन पहले ही उसकी कहानी आपको कोई सुना दे तो आपका मूवी देखने का आनंद कम होगा या बढे़गा?
उत्तर-स्वाभाविक बात तो यही है कि आनंद घट जायेगा।
हम बच्चों को स्कूल जाने से पहले ही ‘ए फोर एप्पल बी फोर बोल’ सीखाने में लग जाते हैं, अर्थात् पढ़ाई कि टेंशन देना प्रारम्भ कर देते हैं। जब इस काम के लिए हम आगे जाकर हजारों रूपये खर्च करने वाले हैं, बड़े-बड़े स्कूलों में भेज कर, तथा अधिक से अधिक समय तक स्कूल में रखना ही है,तो पहले से ही टेंशन क्यों दें?
यदि घर में अन्य बच्चे भी हैं, जो स्कूल जाते हैं, तथा आपका बच्चा उन्हें देखता है और उनके साथ रहता है, या उनके साथ खेल-खेल में पढ़ाई की बातें सीखता है, तो उसमें कोई हर्ज नहीं, क्योंकि बच्चे में इस तरह सीखने का कार्य स्वतः रूप से हो रहा है। इस प्रकार उसके दिमाग पर दबाव जैसा असरनहीं होगा। 2. सामाजिक, पारिवारिक व शिष्टाचार की बातें सिखाएं-
जैसे उठना, बैठना, नमस्ते करना, कपडे़ पहनना, हेलो! हाय! बाय! हाथ मिलाना, माता- पिता, दादा- दादी आदि के पैर छूना सीखायें।
3.डाँट, फटकार व पिटाई का कम प्रयोग करें-
बच्चों को अत्यधिक नहीं पीटना चाहिए। बैठे रहने, खडे़ रहने, टॉफी, मिठाई आदि न देने की सजा दे अथवा धमकी दे।
4.दिन में आवश्यकतानुसार सोने की आदत बनाये।
5.जल्दी सोने व जल्दी उठने की आदत बनाये।
6.जिद्दी बनने से बचायें -
किसी वस्तु या खाने-पीने की चीजों को जब वह मांगे तब न दिलाये जब आपको लगे तब दिलाये या शुरू से ही समय निर्धारित करें एवं उसी समय पर देवें, बच्चे को भी उसी समय पर माँगने के लिए कहे।

4.3-स्कूल लाइफ

प्राथमिक अवस्था

(नर्सरी से पाचवी तक )

मिट्टी को चाक पर रखकर घूमाना प्रारम्भ करना

चाक पर रख कर घूमाना प्रारम्भ करना। जैसे ही बच्चा 3 साल की उम्र को प्राप्त करता है तो उसके लिए बड़े से बड़े स्कूल जहाँ अधिक फीस हो, अच्छी ड्रेस हो, जहाँ बड़े से बड़े बेग ले जाते हो ऐसा स्कूल ढूँढ़कर उसका प्रवेश कराते हैं या अपने पड़ौसी के बच्चे या घर में अपने रिश्तेदारों या दोस्तों के बच्चे कहाँ जा रहे है। आपकी नजर में ऐसे स्कूल आपके बच्चे के लिए अच्छे है । अथवा ऐसे विद्यालय ढूँढे़ जायें जहाँ पढ़ाई, संस्कार व अनुशासन या कठिन परिश्रम एवं माता-पिता की सेवा, सद्भावना आदि सिखने को मिले।
क्या केवल पुस्तकों की नकल करने या नोट बुक को भरते रहने से बच्चा सीख जायेगा?
कभी अध्यापक ही इतना होमवर्क देते हैं, जितना बच्चे पूरे दिन भर बैठकर भी पूरा नहीं कर पाते या पूरा होता भी है, तो माता-पिता की मदद से और जिनके माता-पिता नहीं करते, उन्हें स्कूल में दूसरे दिन अध्यापक की मार खानी पड़ती है। उससे आप के बच्चे पर क्या असर पडे़गा?
प्रश्न-एक पुलिसकर्मी व्यक्ति से मैंने कहा आपका डिपार्टमेंट रिश्वत के लिए बदनाम है ऐसा क्यों?
उत्तर-उन्होंने जवाब दिया कि हमारा सिस्टम ही गलत है, क्योंकि हमारी वास्तविक ड्यूटी 24 घंटे की है कहने के 8 घंटे है लेकिन 8 घंटे की ड्यूटी पूरी करके आने के बाद भी हमें कभी भी, किसी भी वक्त बुलाया जा सकता है, तथा कभी भी मोबाइल बज सकता है, अर्थात् हम घर पर आने के बाद घर से परिवार के साथ या अपने किसी काम से 10 किमी. दूर कहीं भी जाना चाहे तो नहीं जा सकते ।
अर्थात् जो मानसिक रूप से 24 घंटे के लिए पाबंध रहते हैं तो ऐसे व्यक्ति क्या करेगें? उनके संस्कार क्षीण होगें या वह 24 घंटे रूकने का पैसा किसी भी रूप में वसूल करने की कोशिश करेगें।
कहने का तात्पर्य यह है कि किसी भी समझदार या शारीरिक व मानसिक रूप से परिपक्व व्यक्ति को भी यदिजरूरत से ज्यादा कार्य दिया जाये तो वह भी मानसिक रूप से त्रस्त हो सकता है, तो छोटे बच्चे क्यों नहीं?
पारिवारिक वातावरण- बच्चा किसके द्वारा कही गई बात पर अधिक जोर देता है? अपने माता-पिता, भाई-बहिन, पड़ौसी या अपने दोस्तों की सोचो फिर आगे पढ़ो।
जब तक बच्चा प्राइमरी कक्षा तक है या 7-8 साल तक का हो तब तक अपने परिवार के लोगों के द्वारा कही गई बात पर अधिक जोर देता है तथा उनकी बात पर विश्वास करता है या उनकी बातों का ही अनुसरण करता है।
अतः उनसे जो भी बोले सोच समझकर बोले तथा उनके सामने कोई भी ऐसी बातें न करें जो उनके काम की न हो। कोई भी बच्चा उससे जो बोला जाता है, उसे ग्रहण करने से भी ज्यादा उसके सामने जो कहा जाता है, उसे ज्यादा ग्रहण करता है या उसके सामने किसी से भी कुछ बोला जाये तो उसे ग्रहण करता है। बच्चे की पहली और महत्त्वपूर्ण पाठशाला उसका घर तथा उसकी माता ही उसका प्रमुख गुरू होती है। इसलिए बच्चों को सीखाने की बजाय खुद सीखने की कोशिश करें।
सामाजिक वातावरण- इंसान एक सामाजिक प्राणी है जो कि समाज के बिना नहीं रह सकता है। इंसान समाज की प्रमुख इकाई है।
अर्थात् बच्चे को घर में आवश्यकता से ज्यादा बंद करके नहीं रखें। सीखने अथवा जानने के स्तर तक सब कुछ सीखना आवश्यक है चाहे वह अच्छा हो या बुरा, सभी।
आप उसे अच्छा ही अच्छा सीखाओगे, बुरा नहीं देखने दोगे तो अच्छे बुरे में अंतर कैसे करना सीखेगा? या बुराई से दूर रहना या बुराई से बचना कैसे जान पायेगा? आप घर के अंदर ज्ञान तो दे सकते है किंतु अनुभव नहीं। अनुभव के बिना प्राप्त किया गया ज्ञान शून्य है।
आप ने उसे बता दिया चार पैर, दो सींग, एक पूँछ की गाय होती है, यह ज्ञान है। आप उसे गाय दिखाकर कर बताये कि यह गाय है, इसके दो सींग, एक पूँछ व चार पांव होते हैं तथा ये दूध देती है जिसे हम पीते हैं।
स्कूली वातावरण- सावधान, कहीं आपका बच्चा स्कूली दबाव में तो नहीं चल रहा है।
स्कूली दबाव-होम वर्क का भार, समझ में नहीं आना या कम समझ में आना, स्कूल में सबसे पीछे चलना, आने जाने में परेशानियाँ दूसरे बच्चों द्वारा परेशान करना आदि बातें आपके बच्चे पर मानसिक दबाव पैदा करती है।
विद्यालय के दबाव को कम से कम करें कहने का तात्पर्य यह भी नहीं है कि आप विद्यालय जाना ही छुड़वा दें।
क्या कभी आपने अपने बच्चे से यह पूछा कि विद्यालय अर्थात् बच्चे को घर में आवश्यक से ज्यादा बंद करके नहीं रखें। सीखने अथवा जानने के स्तर तक सब कुछ सीखना आवश्यक है चाहे वह अच्छा हो या बुरा, सभी।
आप उसे अच्छा ही अच्छा सीखाओगे, बुरा नहीं देखने दोगे तो अच्छे बुरे में अंतर कैसे करना सीखेगा? या बुराई से दूर रहना या बुराई से बचना कैसे जान पायेगा? आप घर के अंदर ज्ञान तो दे सकते है किंतु अनुभव नहीं। अनुभव के बिना प्राप्त किया गया ज्ञान शून्य है।
आप ने उसे बता दिया चार पैर, दो सींग, एक पूँछ की गाय होती है, यह ज्ञान है। आप उसे गाय दिखाकर कर बताये कि यह गाय है, इसके दो सींग, एक पूँछ व चार पांव होते हैं तथा ये दूध देती है जिसे हम पीते हैं।
स्कूली वातावरण- सावधान, कहीं आपका बच्चा स्कूली दबाव में तो नहीं चल रहा है।
स्कूली दबाव-होम वर्क का भार, समझ में नहीं आना या कम समझ में आना, स्कूल में सबसे पीछे चलना, आने जाने में परेशानियाँ दूसरे बच्चों द्वारा परेशान करना आदि बातें आपके बच्चे पर मानसिक दबाव पैदा करती है।
विद्यालय के दबाव को कम से कम करें कहने का तात्पर्य यह भी नहीं है कि आप विद्यालय जाना ही छुड़वा दें।
क्या कभी आपने अपने बच्चे से यह पूछा कि विद्यालय में क्या चल रहा है? कैसा चल रहा है? स्कूल में क्या अच्छा है? क्या खराब है? स्कूल में मन लगता है या नहीं? समझ में आता है या नहीं? क्या होमवर्क दिया? कितना किया? होमवर्क करने में क्या परेशानी है?
इतना कुछ तो किया नहीं जिसे करना आवश्यक है। अर्थात् उस दबाव को कम नहीं किया जिसे वह पहले से अपने ऊपर रख के लाया है, बल्कि और दबाव डालना प्रारम्भ कर देते है।
होम वर्क करों, फेल हो जाओगे, पढ़ो, इतने नंम्बर आने चाहिए, ये होना चाहिए, वो होना चाहिए। टी. वी. मत देखो, ये मत करो, वो मत करो आदि।
आप या तो बच्चे पर कुछ करने के लिए दबाव डालते हैं या कुछ नहीं करने के लिए दबाव डालते हैं। न कि क्या करना चाहिए? क्या नहीं करना चाहिए? यह समझाने की या बताने की कोशिश नहीं करते है।
आप ये बतायें कि यदि ज्यादा खाना खाओगे तो पेट फूट जायेगा और बिल्कुल नहीं खाओगे तो शारीरिक रूप से कमजोर हो जाओगे और आवश्यकता खाओगे तो हष्ट-पुष्ट हो जाओगे।
उपरोक्त पंक्तियों में खाने की जगह टी.वी. देखना, हँसना, खेलना, बोलना, घूमना आदि शब्द रख कर बता सकते है।

4.3-स्कूल लाइफ

उच्च प्राथमिक अवस्था

(छठी से पआठ्वी तक )

घूमते हुये चाक पर मिट्टी को आकार देना

जैसे ही बच्चा छठी कक्षा में पहुँचा, सैकण्डरी स्तर का हो जाता है। लेकिन आज भी आप उसे आपका एक नन्हा सा बच्चा मानते हैं। अर्थात् बच्चे की तरह मार्गदर्शित करना चाहते है, क्योंकि बच्चा कितना ही बड़ा हो जाये किंतु माँ-बाप की नजरों में बच्चा ही रहता है।
आप अपना नजरिया बदल नहीं पाते । जिसका फायदा आपका बच्चा उठाना प्रारम्भ कर देता है।
आज आपका बच्चा आपका आइना है।
1.यदि वो झूठ बोल रहा है तो समझ लो आप भी झूठ बोलते हैं।
2.यदि आप गाली निकालते हैं तो समझ लो कि वह भी गाली निकालता है।
3.यदि आप दूसरों की बुराई करते हैं, दूसरों के प्रति ईष्या या जलन रखते हैं, तो समझो यह आदतें आपके बच्चे में भी है।
4.यदि आपका बच्चा कायर है, छोटी-छोटी चीजों से डरता है, या उसमें आत्मविश्वास की कमी है तो कहीं न कहीं यह आपके अंदर भी विद्यमान है।
5.आपका बच्चा आलसी या लापरवाह है तो समझ लो कि यही गुण आप में भी मौजूद हैै।
एक बार मेरे दोस्त ने फोन किया कि आपका स्टूडेंट (उसका छोटा भाई जो मेरे पास कोंचिग पढ़ता था) टी.वी. के बिल्कुल पास बैठकर टी. वी. देख रहा है और हमेशा इसी तरह देखता है। कल जब ये कोंचिग आये तो इसकी बढ़िया डाँट लगाना।
मैंने कहा डाँट तो लगा दूँगा परंतु पहले मुझे ये बताओ कि उसके अलावा और कौन-कौन है? या ऐसे कौन व्यक्ति हैं? जो उसके अतिरिक्त टी.वी.बिल्कुल नजदीक बैठकर देखते है? तो उसने कहा देखता तो मैं ही...और फोन काट दिया।
इस उदाहरण को आप असत्य भी मान सकते हैं। किंतु आप अपने स्वयं की कुछ आदतों के बारे में विचार करें और देखो कि वही आदतें आपके बच्चे में है या नहीं।
जो बुराइया आपको आपके बच्चे में भी नजर आती है वही बुराइया या गलतियाँ आपमें भी है लेकिन वो आपको नजर नहीं आती।
जो अच्छाइयाँ आपकी है वही आपके बच्चे में भी है। लेकिन आपको आपके बच्चे में वो अच्छाइयाँ तो नजर नहीं आती है। किंतु बच्चों की बुराइया जरूर नजर आती है।
बच्चा तो आपका ही आइना है जब आपको कभी दूसरों कि अच्छाइयाँ नजर नहीं आती तो आपके बच्चे को भी आपकी अच्छाइयाँ कैसे नजर आ सकती है?
कहने का तात्पर्य यह है कि यदि आप चाहते है कि हमारा बच्चा अंग्रेजी बोले, कम्प्यूटर चलाना सीखे तो आप उसे इंगलिश स्पोकन कोर्स कराते हैं या कम्प्यूटर सीखाते हैं।
लेकिन आप खुद इंगलिश स्पोकन करें व सीखें फिर अपने घर में इंगलिश में थोड़ी बहुत भी बाते करें तो निश्चित ही आपका बच्चा इंगलिश बोलना सीख जायेगा।
मेरा कहने का तात्पर्य यह नहीं है कि आप अपने बच्चे को डॉक्टर या इंजीनियर बनाना चाहते हैं, तो इसके लिए पहले आपको डॉक्टर या इंजीनियर बनना पड़ेगा तथा यह कदापि संभव भी नहीं है।
लेकिन जो अच्छाइयाँ आप अपने बच्चों में डालना चाहते उन अच्छाइयों को पहले आपको अपने जीवन में उतारनी ही पड़ेगी, जैसे कि-सुबह जल्दी उठना, समय पर भोजन ग्रहण करना, जल्दी सोना, सद्व्यवहार पूर्ण बोलना आदि। एवं बड़ों से सम्मान पूर्वक प्रणाम करना।
आप अपने बच्चे से यह अपेक्षा रखते हैं कि वह अच्छे अंक लाये या मन लगा कर पढे़ं?
लेकिन क्यों रखते हो? आपने कभी यह सोचा? नहीं सोचा! सिर्फ देखा कि सभी बच्चे अच्छे अंक लाने की होड़ में लग रहे हैं या नौकरियों के लिए अच्छे अंको की मांग है या पड़ौसी या दोस्त का लड़का अच्छे अंक लाता है। क्या यह भेड़ चाल नहीं है? क्या हम दुसरो के सपनों को अपना सपना बनाने की भूल नहीं कर रहें हैं?
अर्थात् हमारे बच्चों पर हम उन सपनों को थोपते रहते हैं। जो अपने बच्चों के या अपने नहीं है।
यह आपके बालक के जीवन की वह महत्त्वपूर्ण अवस्था है जो कि आपके बालक के पूरे जीवन के लिए महत्त्वपूर्ण होगी। यही वह तीन वर्श (6,7,8) है । जब आपके बच्चे को आपकी आवश्यक है। पूरी जिंदगी में आप उसे समय दें या नहीं दें लेकिन इस समय विशेष रूप से ध्यान दें।
उसके पोषण व अध्ययन में जितनी भी आपने अब तक गलती की है। उसकी भरपाई आप इस समय में कर सकते हैं लेकिन यह समय निकलने के बाद नहीं।
ध्यान देने का मतलब यह भी नहीं है कि दिन भर पढ़ने के लिए बोलें या उसे ज्यादा से ज्यादा मारें, पीटें या एक के बादएक कई प्रतिबंध लगा दे।
जिस तरह चाक पर घूमती हुई मिट्टी जो आपके हाथो में थी। जिसने घड़े का आकार ले लिया है। अब अगर आप दोनों हाथ कुछ क्षण के लिए हटा देगें तो घडे़ का आकार बिगड़ेगा नहीं या इस समय कुम्हार अपने हाथों को कुछ क्षणों के लिए हाथ हटा कर देखता है, कि हाथ हटाने पर घड़ा फैलेगा तो नहीं और हाथ का दबाव हल्का-हल्का हटाता जाता है तथा बिल्कुल हल्के हाथों से ही घडे़ का आकार बढ़ाता जाता है, और यदि इस समय हाथों का दबाव अधिक या कम लगा दिया या कोई चूक हुई तो घड़ा पूरी तरह फैल जायेगा।
बस आपको भी यही करना है। आपको भी अपने बच्चे पर लगाये गये सारे प्रतिबंध इस समय हटाने है, क्योंकि आपके बच्चे की यह वह अवस्था है जिसमें उसकी सृजनात्मक एवं विश्लेषणात्मक, अवलोकनात्मक बुद्धि का पूर्ण रूप से विकास चल रहा है और आपकी ही कोई गलती जैसे हल्के से दबाव से घड़ा फैल जाता है। वैसे ही बच्चे को दिया गया दबाव उसकी विकासशीलता पर विराम चिन्ह लगा देगा।
अतः इस समय अपने बच्चे को आप जितना स्वतंत्र कर सकते हैं उतना स्वतंत्र करें तथा सभी प्रतिबंधों को हटा दें तथा किसी प्रकार के कार्य टी. वी. देखना, घूमना-फिरना, दोस्त बनाना, खाना-पीना, उठना-बैठना ,सोना-जागना जितनी भी छूट दे सकते हैं निश्चित रूप से दें। यह इसलिए नहीं कि मैं कह रहा हूँ बल्कि उसे दिल से छूट दें।
एक कई प्रतिबंध लगा दे।
जिस तरह चाक पर घूमती हुई मिट्टी जो आपके हाथो में थी। जिसने घड़े का आकार ले लिया है। अब अगर आप दोनों हाथ कुछ क्षण के लिए हटा देगें तो घडे़ का आकार बिगड़ेगा नहीं या इस समय कुम्हार अपने हाथों को कुछ क्षणों के लिए हाथ हटा कर देखता है, कि हाथ हटाने पर घड़ा फैलेगा तो नहीं और हाथ का दबाव हल्का-हल्का हटाता जाता है तथा बिल्कुल हल्के हाथों से ही घडे़ का आकार बढ़ाता जाता है, और यदि इस समय हाथों का दबाव अधिक या कम लगा दिया या कोई चूक हुई तो घड़ा पूरी तरह फैल जायेगा।
बस आपको भी यही करना है। आपको भी अपने बच्चे पर लगाये गये सारे प्रतिबंध इस समय हटाने है, क्योंकि आपके बच्चे की यह वह अवस्था है जिसमें उसकी सृजनात्मक एवं विषलेशणात्मक, अवलोकनात्मक बुद्धि का पूर्ण रूप से विकास चल रहा है और आपकी ही कोई गलती जैसे हल्के से दबाव से घड़ा फैल जाता है। वैसे ही बच्चे को दिया गया दबाव उसकी विकासशीलता पर विराम चिन्ह लगा देगा।
अतः इस समय अपने बच्चे को आप जितना स्वतंत्र कर सकते हैं उतना स्वतंत्र करें तथा सभी प्रतिबंधों को हटा दें तथा किसी प्रकार के कार्य टी. वी. देखना, घूमना-फिरना, दोस्त बनाना, खाना-पीना, उठना-बैठना ,सोना-जागना जितनी भी छूट दे सकते हैं निश्चित रूप से दें। यह इसलिए नहीं कि मैं कह रहा हूँ बल्कि उसे दिल से छूट दें।
स्वतंत्रता भी दो तरह की हो सकती है। एक तो ऊपर से देना (डरते-डरते देना) या खुश होकर (पूरे आत्मविश्वास के साथ) देना।
उदा.1-आपके बच्चे ने आपसे इजाजत मांगी कि मुझे घूमने जाना है और आपने उसे घूमने जाने की इजाजत भी दे दी लेकिन साथ में यह भी चेतावनियाँ दे दी कि ऐसा मत करना, वैसा मत करना समय पर घर आना आदि इससे अच्छा तो ये होता कि उसे इजाजत ही नहीं देते।
उदा.2-ये तो वही बात हुई ना किसी को दावत पर बुला लिया और कहा खाना नहीं है बस देख कर या सूंघ कर ही पेट भरना है या खाने की इजाजत दे भी दी तो यह कह दिया कि पेट भर कर न खाये या ऐसा तो कौन बोलता है? लेकिन इतना तो बोलते हैं या करते हैं कि आज कल सब्जियाँ बड़ी महंगी हो रही है या उसी समय सब्जियों के भाव गिनाने या बताने लगे तो क्या ऐसी दावत का सेवन करना हम पसंद करेंगे? या ऐसी दावत में जाना पसंद करेंगे?

शायद हो सकता है आपको मेरी बात अजीब सी लगे। कि कैसा लेखक है? कि छोटी सी उम्र में बच्चे को जो न तो कुछ जानता है न पहचानता है ऊपर से आज का जमाना बड़ा खराब है। उसमें भी बच्चे पर लगाये जाने वाले सभी प्रतिबंध हटाने की सलाह दे रहा है। क्या आपको पता है...
आज से पहले या आज भी हो सकता है कि कहीं तोऐसा होता होगा ही...
जिनके पास खेत हो वह अपने खेत की रखवाली के लिए कुत्ते पालते हैं, और वह कुत्ते खेत के मालिक के अलावा हर अजनबी पर दौड़ पडे़ या भौंकने लग जाये तो इसके लिए वह अपने ही खेत में एक गड्डा बनाते हैं तथा उसमें कुत्ते को रख दिया जाता है फिर मालिक रोज उसे उस गड्डे में रोटी देता है या खाना खिलाता है लगभग महिने भर तक ऐसा करने के बाद उसे उस गड्डे से बाहर निकाल देता है। तो वह कुत्ता मालिक के अतिरिक्त हर अजनबी व्यक्ति पर भौंकता है और उसे काटने के लिए दौड़ता है।
यही प्रयोग आप अपने बच्चे पर जमाने के डर से या बच्चे के बिगड़ने से डर से करते हैं। फिर जैसे ही प्रतिबंध रूपी गड्डे से बाहर निकलता है तो अपनी इच्छाओं को पूरी करने के लिए प्रेरित होता है इसलिए प्रतिबंध की सलाखों को तोड़ दे और उसे अपनी इच्छाओं को पूरा करने दें।
लेकिन ध्यान रहे मैं प्रतिबंध की सलाखों को हटाने के लिए कह रहा हू तथा स्वतंत्रता प्रदान करने पर जोर दे रहा हू न कि बच्चे पर ध्यान न देने के लिए।
उदा.-वीणा के तारों को इतना भी ढ़ीला नहीं करें कि उससे सुर ही नहीं निकले और तारों को इतना भी नहीं कसें की तार ही टूट जाये। सुर तभी निकल पाते हैं जब तार न तो कसे हुए हो न ही ढीले हो।
बच्चे को स्वतंत्र छोड़ देने के बाद वह जब भी अच्छाकाम करें तो उसे शाबासी देंकर उसका आत्मविश्वास बढ़ाये तथा गलती करने पर उसे डाँटने की बजाय उसे गलती के परिणामो से अवगत करायें।
यही कार्य आप अक्सर उसके अध्ययन को लेकर भी करते हैं 6 घंटे विद्यालय में फिर 2-3 घंटे कोचिंग फिर 2-3 घंटे आप पढ़ाने बैठ जायेगें अर्थात् 12-14 घंटे उसके किताबो के साथ ही बीतते हैं जिसके कारण या तो वह पढ़ाई से उपरत होकर पढ़ना छोड़ देता है या पढ़ भी लिया तो हर बार एक नई डिग्री लटका लेता है। 24 घंण्टे पढ़ाई की व्यस्तता में रहने के कारण वह अच्छा तोता तो बन जाता है, लेकिन योग्य नागरिक नहीं बल्कि एक असंस्कारी या असामाजिक या कुसंस्कारी एवं कुछ असामाजिक तत्व की श्रेणी में आ जाते है। इसका जिम्मेदार कौन है?... कौन है?... कौन है?...
सिर्फ आपकी महँगी से महँगी जेल, आपके कठोर नियम, सिद्धान्त व असहनीय प्रतिबंध... इस कुशिक्षण को जन्म देने वाले न बनें। कुशिक्षण को कुशिक्षण में बदलने का प्रयास करें।
कुशिक्षण के प्रभावः- भष्टाचार, शोषण, असामाजिकता
आप अपने बच्चे को अच्छा बनाने की कोशिश करें न कि उसे बुरा बनाने की (पढ़ा लिखा अनपढ़ गंवार बनाने की) । काला अक्षर भैंस बराबर कहावत अनपढ़ के लिए तो अच्छी लगती है मगर पढे़ लिखे लोगों के लिए नहीं।

थोड़ा बहुत तो पढ़ ले बेटा

कहती है रोती-बिलखती माता,
थोड़ा बहुत तो पढ़ ले बेटा।
बाप तेरा मजदूरी करता,
खून पसीना अपना बहता।
एक-एक पैसा कमाता,
तेरे स्कूल की फीस भरता।
हर मौसम में चप्पल में जाता,
मगर तुझे अच्छे शूज दिलाता।
रोज हमारा पेट काटा,
मुश्किल से तुझे पढ़ाया।
तेरी हर जिद्द पूरी करता,
तु दिन भर टी.वी. देखता।
अध्यापक तुझे रोज समझाता,
फिर भी देर तक बाहर घूमता।
पेपर में नम्बर कम लाता,
मुश्किल से पास होता।
ऐसे काम नहीं चलता,
पैसे की क्यू बर्बादी करता?
बुढ़ापे का सहारा बनता,
ये सोच के हमने पाला।
सहारे की हमें नहीं चिंता,
खुद अपना तो बन सहारा।
जीवन में कुछ बन तो जाना,
दर-दर की ठोकरें मत खाना।
कहती है रोती-बिलखती माता,
थोड़ा बहुत तो पढ़ ले बेटा।

4.3-स्कूल लाइफ

माध्यमिक्क अवस्था

( नवीं से दसवी तक )

मटके को चाक से उतर कर शुकने के लिए रखना

यह वह अवस्था है जब चाक पर घूमता हुआ घड़ा जिसनेे अपना पूरा आकार ले लिया है, अब कुम्हार उसे सूखने के लिए चाक से उतार कर छाँव (न की तेज धूप में) में सूखने के लिए रख देता है।
कहने का तात्पर्य यह है कि आज आपका बालक अपना आकार ले चुका है या प्राइमरी को पूर्णत खत्म करके सैकण्डरी की अवस्था पर है अब आप अपने बच्चे को पढ़ाई से सम्बन्धित निर्णयों को स्वयं लेने के लिए स्वतंत्र करें। उसका खुद का निर्णय ही वास्तविक रूप से सही होगा क्योंकि उसकी मानसिकता, योग्यता व विचारधाराओं को उससे बढ़िया कोईनहीं जानता। जिस तरह से बहता हुआ पानी अपना रास्ता स्वयं बना लेता है। उसी तरह उसे भी अपने रास्ते को स्वयं तय करने दें।
क्योंकि मटके को उतार कर सही स्थान पर रखना तो कुम्हार का कार्य है लेकिन सूखना स्वयं को ही है अर्थात् प्रकृति स्वयं उसे सूखा देती है लेकिन प्रकृति पर निर्भर न रहकर उसे जल्दी सूखाने के लिए अपने प्रयास करेंगे तो मटका कई जगह से तड़क जायेगा।
उसी प्रकार इस अवस्था में हम बच्चे पर यदि स्वयं के निर्णयों को मनवाने के लिए मजबूर करते हैं तो उसकी नजर में आपकी छवि में बदलाव या बगावत की चिंगारी की शुरूआत में पैदा हो जाती है तब यह चिगांरी आपकी व आपके बच्चे की सफलता को नुकसान पहुँचाती है।
कुम्हार जब मटके को उतार कर छाव में सूखने के लिए रख देता है तब उसकी सुरक्षा भी रखता है, कहीं किसी प्राकृतिक या कृत्रिम घटना द्वारा वह गिर कर टूट न जाये।
अर्थात् आपको उस पर अपने निर्णय थोपने तो नहीं है लेकिन गिरने, टूटने या हतोत्साहित न होने देने का पूरा-पूरा या भरसक प्रयत्न करना है।
यह बालक की जरूरत से ज्यादा कोन्फीडेन्श या डिप्रेशन में जाने की अवस्था है।
जिस तरह से मटके को पूर्णत सूखने के बाद उसे आग में डालकर पकाया जाता है।
उसी प्रकार 10 वीं के बाद सीधा आपके बच्चों को इस संसार के ताप को सहन करना है और वह स्वयं उस बच्चे को ही करना है न की उसकी जगह कोई और करेगा।
ध्यान रहे कुछ मटके/घड़े ऐसे होते हैं जो आग के ताप को सहन नहीं करते हैं और खत्म हो जाते हैं।
प्रश्न-जो घड़ा आग की ताप को सहन नहीं कर पाया और टूट गया। उसका कारण यदि कुम्हार से पूछेगें तो क्या जबाव देगा?
उत्तर-यही कहेगा कि जो अब तक प्रक्रिया की गई उसमें कोई न कोई त्रुटि रह गई है। उसकी त्रुटि से खास नुकसान नहीं होगा लेकिन आपकी त्रुटि आपके बच्चे के लिए भारी हो सकती है जिसे फिर सुधारा नहीं जा सकता है।

10 वीं कक्षा एक महत्त्वपूर्ण कक्षा है। इस कक्षा की प्रसेंट से ही आपका बच्चा या आप निर्णय लेते हैं कि वह आगे क्या करेगा? या आप क्या करवायेंगें या बनायेगें?
जो बच्चा 10 वीं पास हो जाता है तो अपनी पढ़ाई को वह किसी भी उम्र में चालू कर सकता है क्योंकि 10 वीं पास व्यक्ति 12 वीं का प्राइवेट फोर्म भर कर वनवीक सीरीज से पढ़कर पास हो सकता है।
लेकिन वह 10 वीं ही फैल हो जाये तो समझो वह आगे जीवन में कभी नहीं पढ़ पायेगा क्योंकि 10वीं पास करना 12वीं की अपेक्षा अधिक कठिन है क्योंकि 10 में सभी विशय होते हैं। इसमें अध्यापक के बिना पढ़ाई नहीं हो सकती तथा किसी भी किया जा सकता है। स्कूल या कोंचिग की तथा नियमित पर्याप्त समय देने की आवशयकता होती है।

मैरी नैया पार लगा दो

माता मेरी कोचिंग लगा दो।
मैरी नैया पार लगा दो।।
दोस्त मेरे अंक ज्यादा लाते।
मुझको रोज नीचा दिखाते।।
मैं भी चाहूँ अंक ज्यादा आये।
अखबार में मेरा फोटो आये।।
बड़ा होकर नाम कमाऊँ।
तेरे लिए बड़ा घर बनाऊँ।।
देष के लिए कुछ कर पाऊँ।
तेरे दूध का कर्ज चुकाऊँ।।
पैरों पर मैं खड़ा हो जाऊँ।
जीवन का हर सुख तुझे दे पाऊँ।।
दुनियाँ को एक नई राह दिखाऊँ।
धरती का मैं बोझ न कहलाऊँ।।
इस माँ की रक्षा का संकल्प उठाऊँ।
माता मेरी कोचिंग लगा दो।
मैरी नैया पार लगा दो।।

4.3-स्कूल लाइफ

उच्च माध्यमिक्क अवस्था

पकाने के काबिल हे या नहीं यह निर्णय लेना

यह आपके बालक की वह अवस्था है जिसमें कि कुम्हार द्वारा चाक पर मटका बन चुका होता है तथा उसे अभी आग में रखकर नहीं पकाया गया है। लेकिन उसे देख कर यह निर्णय लिया जाता है कि यह पकाने के योग्य है या नहीं।
ग्यारहवीं कक्षा वह है। जिसमें बच्चा अपनी अब तक की योग्यता या अब तक पढ़े गये सभी विषयों में से अपनी इच्छानुसार विषय (आट्र्स, कामर्स या सांइस) चुनता है।
बच्चे किस आधार पर विषय चुनते हैं?
1.जो विषय पढ़ने में अच्छा लगता है। शिक्षा की परिभाषानुसार या शिक्षा के महत्त्वानुसारव्यक्ति कभी उस कार्य में थकता या बोर नहीं होता जो कार्य उसकी पसंद या रूचि का होता है। व्यक्ति सफल भी उसी कार्य में होता है, जो कार्य उसकी रूचि से किया गया हो।
कोई भी व्यक्ति उस कार्य को शत्-प्रतिशत मेहनत तथा लगन से कर सकता है जो उसकी पसंद का होता है।
2.जिसमें स्कोप अधिक हो। इनकी प्रकृति प्रोफेशनल है या केवल इनकी नजरों में धन की पूर्णतः महत्ता है और धन के सिवाय इनका ध्यान कहीं नहीं है, इस कथन को भी कुछ सीमा तक सत्य माना जा सकता है।
लेकिन स्कोप भी बदलते रहते हैं क्योंकि किसमें स्कोप अधिक है, यह आप उस दिन देख रहे है। जिस दिन आप विषय का चयन कर रहे है और उसके 5-7 साल बाद उस क्षेत्र में स्कोप रहे यह जरूरी नहीं है।
तथा आपने जिस स्कोप के लिए मेहनत की वही नहीं रहे तो आपकी सफलता ही नहीं बल्कि आपकी मानसिक स्थिति भी बाधित हो जायेगी।
3.वह स्वयं अपने सपने के अनुसार कि उसे डॉक्टर बनना है या इंजीनियर बनना है... इस ऑप्शन को कुछ सीमा तक सही मान सकते हैं। लेकिन सपने किसी खूबसूरत लड़की से कम नहीं होते हैं। जबतक लड़की खूबसूरत नजर आती रहेगी तब तक आप उसके पीछे चलते रहेगें लेकिन जिस दिन वह खूबसूरत लगना बंद हो गई उसी क्षण आप वहाँ रूक जायेगें और सफलता बाधित हो जायेगी।
वैसे भी सपनों का क्या भरोसा कब बदल जाये। कब नींद खुले और टूट जाये।
4.अपनी दसवीं की प्रतिशत देखकर 60-70 के ऊपर हुई तो साइन्स या कम हुई तो आट्र्स ले लेता है। जो प्रतिशत मार्कशीट में आई है वो प्रतिशत पूर्णतया आपकी बुद्धि का मूल्यांकन नहीं हो सकती है।
शायद आपने जो पढ़ा या किसी कोचिंग का गैस पेपर बैठ गया और आपकी 70 प्रतिशत बन गई और अब 70 प्रतिशत को देखकर साइंस ले रहे।
इसी कारण हर साल स्टूडेंट 11 वीं में साइंस चुनते है जिसमें पाँच प्रतिशत विद्यार्थी पुस्तकें देखकर विचार बदल लेते हैं, पाँच प्रतिशत फार्म भरने से एक दिन पूर्व विचार बदल लेते हैं, और पहले दिन से दो महिने के अंतराल में छात्र साइंस छोड़ कर वापस आटर्स ले लेते हैं, और पाँच प्रतिशत छात्र 11 वीं में साइंस पढ़ते हैं और 12 वीं में आट्र्स या कोमर्स ले लेते हैं।
पाँच प्रतिशत छात्र 12वीं में दो महिने तक साइंस पढ़कर विषय बदल लेते हैं। 5 प्रतिशत छात्र अपने अहम् के कारण छोड़ते तो नहीं लेकिन फेल होने का इतंजार करते हैं और पाँच प्रतिशत किस्मत भरोसे चलते रहते हैं। कुछ छात्र ऐसे भी होते है जो घर से पॉकेट मनी अच्छी प्राप्त करने के कारण साइंस पढ़ते रहते हैं।
5.माता-पिता या अध्यापक के कहने पर विषय चुनता है। अध्यापक किस आधार पर साइंस, आट्र्स, काॅमर्स, आई. टी. आई. की सलाह देते हैं?
1.बालक की बुद्धि के आधार पर
2.बिना सोचे समझे
3.कमीशन के कारण
4.कोचिंग के कारण
5.बालक की पारिवारिक परिस्थिती के आधार पर
6.स्कोप के आधार पर
यह तो विद्यार्थी को ही समझना होगा कि अध्यापक की सलाह देने के बाद भी विद्यार्थी स्वयं निर्णय लेता है या नहीं?
माता-पिता
माता-पिता की आज्ञा को तो मानना ही चाहिए लेकिन हमारे माता-पिता ने किस आधार पर निर्णय लिया है? ये उस बच्चे को जानकारी होनी चाहिए। यदि उस निर्णय में कोई ऐसी वजह जो उनके चिंतन विषय के अंतर्गत न हो तो माता-पिता को बताने का कार्य भी विद्यार्थी का ही है।
6.अपनी पारिवारिक या आर्थिक स्थिति को देखते हुऐ प्रतिशत किस्मत भरोसे चलते रहते हैं। कुछ छात्र ऐसे भी होते है जो घर से पॉकेट मनी अच्छी प्राप्त करने के कारण साइंस पढ़ते रहते हैं।..................

मैरी नैया पार लगा दो

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4.4- कॉलेज लाइफ

महाविद्यालय(बी. ए., बी. कोम...) अवस्था

आग में पकाना

यह वो अवस्था है जबकि कुम्हार सूखे हुये मटको को उल्टा करके रखता है तथा अग्नि में जला कर उसे पकाता है।
अर्थात् कालेज लाइफ वह अवस्था है जब उसका पकना प्रारम्भ होता है। विद्यार्थी को कठिन परिश्रम करना पड़ता है और कठिन परिश्रम को सफलता की नींव कहा जा सकता है।
किसी भी सफल व्यक्ति की सफलता आसमान से नहीं टपकती। सफल व्यक्ति ने प्रारम्भ से ही तन-मन से मेहनत की है और हर परिस्थितियों का सामना डट कर किया है न कि परिस्थितियों से भागा होगा।
काॅलेज स्तर की पढ़ाई चाहे आट्र्स हो या साइंस हो, डिप्लोमा या डिग्री हो इनमें विद्यार्थी मात्र पास कैसे हो सकतेहै? यह फंड़ा लगाते हैं, जैसे शार्ट नोट्स या वन वीक सीरीज... आदि पूरे सेलेबस को समझना तो बहुत दूर की बात है वनवीक सीरीज जैसी पुस्तको में भी महत्त्वपूर्ण ढूंढकर कर बस उन्हें पढ़ लेते हैं।
किसी भी स्टूडेंट से जो बी.ए. का पेपर करके बाहर निकला हो उससे पूछा जाये पेपर कैसा गया? अच्छा गया। क्या आया था? बतायेगा नहीं, बल्कि पेपर देगा यह आया था। कितने प्रष्न किये ? पाँचों प्रश्न कर दिये। क्या लिखा? सब कुछ लिख दिया। कितनी कोपिया भरी, 3 कोपिया भर दी, पास होने के लिए काफी है और वो पास भी हो जाता है।
पुस्तकों का उद्देश्य विद्यार्थी को उस विषय से सम्बंधित ज्ञान देना था। लेकिन उसने उस ज्ञान को प्राप्त करने की नहीं बल्कि डिग्री कैसे लेनी है, इस और ध्यान दिया है।
‘‘पापा कहते हैं बेटा बड़ा काम करेगा।
मगर ये तो कोई न जानें
बेरोजगारी की लाइनों में अपना नाम करेगा। ।’’
कहने का तात्पर्य जब विद्यार्थी के पकने का समय था। तब उसने उस ताप को सहन नहीं किया।
बाजार में बिना पके आमों के खरीदार तो मिल सकते हैं, लेकिन बिना पके मटके के खरीददार नहीं मिलेगें इसलिए विद्यार्थी की तुलना आम से नहीं कच्ची मिट्टी के घडे़ से की गई है।
पढ़ाई से नाता तोड़ रहा है

पढाई से नाता तोड़ रहा हे

रोज एक दिवाना आता है। किताबों को पीछे रखकर लाता है।। गाड़ी को गोल घूमाता है। सामने जब लड़कियों को पाता है।। किताबों में मन को कम लगाता है। लड़कियों को घूरता रहता है।। रोज नई जींस पहन के आता है। पेन रोज एक नया गुमाता है।। मोबाइल सबसे मंहगा रखता है। दिनभर उसमें फेसबुक चलाता है।। क्लास में कभी- कभी आता है। केंटिन में रोज पेप्सी पीता है।। परीक्षा में नम्बर कम लाता है। लड़कियों को फोन घूमाता है।। मम्मी-पापा से पैसे ठगता है। घर के पैसों की बर्बादी करता है।। हर लड़की से आई लव यू बोलता है। थप्पड़ खाकर गर्लफ्रेंड़ बताता है।। पढ़ाई से नाता तोड़ रहा है। अपनी ही कब्र खोद रहा है।।

अध्याय -6 विषय

प्रश्न-विषय क्या है?
उत्तर-सब्जेक्ट। लेकिन सब्जेक्ट इसका अंग्रेजी उच्चारण मात्र है। हम नई-नई कक्षाओं में जाते हैं। नये-नये सब्जेक्ट हमें पढ़ने को मिलते हैं या पढ़ते है। परंतु हमारा ध्यान इस ओर नहीं जाता कि हमें नये-नये या अलग- अलग विषय क्यों पढ़ाये जा रहे हैं? या हम क्यों पढ़ रहे है? बस सभी पढ़ रहे हैं और हम भी भेड़ चाल चल रहे हैं।
इन विषयो को अधिकतर विद्यार्थी-
नौकरी प्राप्त करने
प्रतिशत बनाने का साधन
सीधा/सरल की दृश्टि से
डिग्री लेने के लिए
आदि कारणों से पढ़ रहे है, और हम ऐसा मानने की परम्परा को बढ़ावा देते जा रहे हैं।
विशय का षब्द अर्थ- संज्ञा, क्रिया, विषेशण के आधार पर सब्जेक्ट के कई अर्थ होते हैं जैसे-प्रजा, समस्या, अधीन-वस्तु, विषय-वस्तु, नागरिक, अधीनस्थ करना, वष में करना, हराना, परवष करना, अधीनस्था, शासनाधीन, आश्रित, उपजीवी, विवश आदि।
विषय की परिभाषा- हिन्दी, गणित, विज्ञान ... ही को हम विषय मानते हैं। लेकिन हिन्दी विषय नहीं है। बल्कि विषय ककिसी एक भाग को हिन्दी नाम दिया गया है तो किसी भाग को गणित तो किसी ... यह सोच कर देखें कि ऐसा क्या है जो विषय नहीं है सब विषय है। जो भी हम देखते हैं, सुनते हैं, पढ़ते हैं, खेलते हैं अर्थात् हमारे द्वारा किया गया अथवा देखा गया प्रत्येक कार्य ही किसी न किसी विषय के अंतर्गत आता है।
अर्थात् हम और हमारे चारों और जो कुछ भी है वह विषय है। हम उन विषयो से घिरे हुऐ हैं। फिर भी हम गणित, विज्ञान या अंग्रेजी आदि से भागना चाहते हैं। लेकिन गणित से कहीं दूर भाग के नहीं जा सकते हैं। कल्पना करो अगर किसी ने गणित , विज्ञान, अंग्रेजी या इतिहास से छुटकारा पाने के लिए पढ़ाई छोड़ दी लेकिन क्या वह जीवन में जोड़, बाकी, मोटर, इंजन आदि केे बिना रहेगा? अपनी या अपने परिवार की गुजरी घटना (इतिहास) से नाता तोड़ देगा।
यदि कोई पति और पत्नी दोनों का आपस में झगड़ा हुआ पति ने अपनी पत्नी को छोड़ दिया तो किसे छोड़ा? मात्र पत्नी के शरीर को छोड़ा है। लेकिन क्या वह मन से उसे छोड़ पाता है? या मन से छोड़ना संभव है?
जैसे कोई बच्चा स्टेज पर खड़ा होकर यह कहे कि मैंने धरती को छोड़ दिया या छत के ऊपर खड़ा होकर कहे कि मैं आसमान से दूर चला गया।
कोई विषय सरल या कठिन, सस्ता और महँगा, अच्छा या बुरा, हल्का या भारी, नरम या कड़क नहीं होता है। बल्कि विषय हमारे लिए ज्ञात या अज्ञात होते हैं।
विषय भारी, सरल या कठिन नहीं होते हैं, क्योंकि जो विषय आपके लिए कठिन है, वही विषय जरूरी नहीं कि सबके लिए ही कठिन हो वैसे ही जो आपके लिए रोचक या महत्त्वपूर्ण है, वही दूसरों के लिए अरोचक या अमहत्त्वपूर्ण भी हो सकता है।
हम विषय के लिए नहीं बल्कि विषय हमारे लिए बने है। हम किसी विषय को बनाते भी हैं, तो हम विषयो से कुछ बनते भी हैं।
हम मिठाइयों के लिए नहीं बल्कि मिठाइयाँ हमारे लिए बनी है। हम किसी मिठाई को बनाते भी है तो हम मिठाइयों से पोष्टिकता व स्वाद भी पाते हैं। विषयो को हमने मात्र एक पास होने का साधन माना है। जिन्हें हम पार करने की कोशिश करते हैं परंतु आपने अब तक सोचा अंग्रेजी, गणित, विज्ञान आदि विषयो को पढ़ा तो क्या इन विषयो का विकास हुआ? नहीं हुआ। तो हुआ क्या? बस आप पास हो गये, इतना ही नहीं बल्कि साथ ही आपका विकास हुआ। कहने का तात्पर्य है कि आपने अंग्रेजी, गणित, विज्ञान... आदि विषय पढे़ लेकिन इन विषयो का विकास नहीं हुआ किंतु आपका इन विषयो में विकास हो गया। वैसे ही आपने 10वीं, 11वीं, 12वीं कक्षा पढ़ी, तो 10वीं, 11वीं, या 12वीं का विकास नहीं हुआ बल्कि आपका विकास हो गया।

.....

देष के नागरिक बन जाते हैं। नगर की इकाई को नागरिक कहते हैं तथा नगर की इकाई मनुष्य है। मनुष्य के बिना या अच्छे नागरिक के बिना देष का विकास या देष का अच्छा नागरिक बने बिना आपका सुव्यवस्थित विकास संभव नहीं है।
अर्थषास्त्रः- पूरी दुनिया अर्थ पर टिकी है। अर्थ के बिना कोई लेन-देन संभव नहीं या लेन-देन बिना भी जीवन संभव नहीं अतः अर्थषास्त्र का ज्ञान दिया जाता है।
इतिहासः-इतिहास के बारे में सब यही कहते हैं, कि कहाँ गड़े मुर्दे उखाडे़?, कुछ याद नहीं रहता या कहाँ तक सन् याद करें? कुछ लोग तो इतिहास से सिर्फ इसलिए डरते हैं, कि सन् याद नहीं होते।
लेकिन मुद्दे की बात यह है कि 11वीं, 12वीं, या बी.ए. किसी भी कक्षा में सन् नहीं लिखने होते हैं। सन् सिर्फ छोटी कक्षाओं के लिए उपयोगी हैं, जो कि मुख्य-मुख्य सन् होते हैं। तथा प्रतियोगी परिक्षाओं में सन् याद करने होते हैं क्योंकि सन् से सम्बन्धित प्रश्न रखे जाते हैं।
इतिहास को हमारी शिक्षा प्रणाली ने प्राचीन, मध्य आधुनिक तीन भागों में बाँटा है। इतिहास हमें यह नहीं बताती कि पिछले युगों में मानव ने क्या किया? बल्कि यह बताती है कि तुम्हें मनुष्य में क्या करना है तथा जो तुम कर रहे हो वह हर क्षण खत्म होता जा रहा है या इतिहास का रूप लेता जा रहा है।
इतिहास हमें बताती है कि जो आप कर रहे है वह करते ही उसी क्षण नश्वर होता है। कितना ही अच्छा या कितना ही खराब क्यों न करे? वह नश्वर होगा। इतिहास यह भी बताती है कि आप चाहे कुछ करें या नहीं करें, दोनों का प्रभाव दूसरे व्यक्तियों पर पड़ता है।
जैसे मैं शराब पीता हूँ। तो मेरे इस कर्म से मुझे जानने वालों में कोई शराब पीने की तो कोई शराब न पीने की प्रेरणा ले सकता है, और यदि मैं शराब नहीं पीता हूँ तब भी मुझसे कोई शराब पीने की प्रेरणा ले सकता है, तो कोई न पीने की प्रेरणा ले सकता है। आप किस श्रेणी में आते है... एक श्रेणी सफल व्यक्ति की है तो एक असफल व्यक्ति की है।
लोक प्रशासन- शासन व प्रशासन में इतना ही अन्तर है कि शासन अच्छे या बुरे दोनों तरीकों का हो सकता है जबकि प्रशासन एक व्यवस्थित व हितकारी कार्य के संचालन का एक ढ़ंग या तरीका है। लोक प्रशासन इतना बताना चाहती है कि संगठन में ही शक्ति है। तथा यह पक्ति संगठित होकर कार्यो को करने से पैदा होती है।
हम अच्छे शासन करने वाले या लोगो को अपनी बात मनवाने मै या अधिक से अधिक लोगो को अपने साथ जोड़ने में कितने समर्थ है या अपनी बात को दूसरे के सामने कितनी अच्छी तरह से रख सकते हैं, क्योंकि एक योग्य एवं कुशल नेता ही राष्ट्र को खुशहाल बना सकता है।
राजनीति विज्ञान- राजनीति विज्ञान का उद्देष्य इतना ही नहीं कि आप नेता बनो या राष्ट्रपति बनने के लिए तुम्हारी क्या योग्यता होनी चाहिए? तथा बनने के बाद तुम्हें क्या-क्या कार्य करने है? या कैसे करने हैं? यह उसका छोटा सा आंकलन है क्योंकि हर व्यक्ति को तो राष्ट्रपति नहीं बनाना है। बल्कि जिस देष में तुम रह रहे हो उस देष की सरकार कैसे चल रही है? पूरे देष को एक सूत्र में बांध कर एक व्यक्ति द्वारा उसका संचालन कैसे चल रहा है?
उसमें आपके अनुसार अच्छा क्या हो या गलत कहाँ है? उसको समझना है। उसका उपयोग तुम अपने घर, समाज, संस्थान कम्पनी आदि में कैसे कर सकते हैं।
किसी न किसी दिन हर व्यक्ति को अपने घर की बागडोर संभालनी पड़ती है। जिस दिन घर की बागडोर आपके हाथ में आती है। उस दिन आप अपने घर के एक राष्ट्रपति हो या हर व्यक्ति को अपने घर समाज, संस्थान... आदि में कभी राष्ट्रपति, कभी प्रधानमंत्री तो कभी चपरासी की भूमिका निभानी पड़ती है।
अंग्रेजी, हिन्दी, संस्कृत-यह विषय नहीं है, बल्कि एक भाषा है।
भाषा -कोई भी दो सजीव जिनके बीच में भाषा न हो तो कुछ सीमा तक वह निर्जीव है। आप यह भी सोच सकते हैं कि जो व्यक्ति बोल नहीं सकता उसका भी तो काम चल रहाहै। वह इषारे तो कर सकता है। किंतु इशारे भी भाषा के ही अंतर्गत आते हैं।
‘‘आवश्यकता ही अविष्कार की जननी है।’’ अर्थात् जब तक किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं होती तब तक अविष्कार नहीं होता। यदि भाषा का अविष्कार हुआ है, तो हमें इसकी स्वाभाविक रूप से आवश्यकता थी। जिस वस्तु का अविष्कार पहले हुआ है, उस वस्तु का महत्त्व भी हमारे लिए सबसे ज्यादा है।
हम पढ़ते आये हैं कि सबसे पहले आग का अविष्कार हुआ। किन्तु भाषा के अविष्कार को हम आग से भी पहले मान सकते हैं। चाहे वह एक दो शब्दों या कोड तक ही सीमित क्यों न हो।
दो या दो से अधिक व्यक्तियों के बीच विचारों के आदान-प्रदान के लिए काम में लिया गया माध्यम ही भाषा है। इसलिए भी अध्ययन की शुरूआत का पहला अध्याय भी भाषा से ही प्रारम्भ होता है।
‘‘ए फोर एप्पल बी फोर बाॅल (अंग्रेजी व्याकरण) या अ से अनार आ से आम (हिन्दी व्याकरण)’’
गणितः-गणित के बिना कोई भी पूर्ण नहीं है अर्थात् गणित के बिना हमारा कोई भी कार्य असंभव जैसा हो जाता है। आग से पहले जैसे भाषा का अविष्कार हुआ होगा वैसे ही भाषा से भी पहले गणित का अविष्कार होना संभव है।
आत्म कल्पना करें कि पहला मनुष्य जिसने धरती परदेष के नागरिक बन जाते हैं। नगर की इकाई को नागरिक कहते हैं तथा नगर की इकाई मनुष्य है। मनुष्य के बिना या अच्छे नागरिक के बिना देष का विकास या देष का अच्छा नागरिक बने बिना आपका सुव्यवस्थित विकास संभव नहीं है।
अर्थशास्त्रः- पूरी दुनिया अर्थ पर टिकी है। अर्थ के बिना कोई लेन-देन संभव नहीं या लेन-देन बिना भी जीवन संभव नहीं अतः अर्थशास्त्र का ज्ञान दिया जाता है।
इतिहासः-इतिहास के बारे में सब यही कहते हैं, कि कहाँ गड़े मुर्दे उखाडे़?, कुछ याद नहीं रहता या कहाँ तक सन् याद करें? कुछ लोग तो इतिहास से सिर्फ इसलिए डरते हैं, कि सन् याद नहीं होते।
लेकिन मुद्दे की बात यह है कि 11वीं, 12वीं, या बी.ए. किसी भी कक्षा में सन् नहीं लिखने होते हैं। सन् सिर्फ छोटी कक्षाओं के लिए उपयोगी हैं, जो कि मुख्य-मुख्य सन् होते हैं। तथा प्रतियोगी परिक्षाओं में सन् याद करने होते हैं क्योंकि सन् से सम्बन्धित प्रश्न रखे जाते हैं।
इतिहास को हमारी शिक्षा प्रणाली ने प्राचीन, मध्य आधुनिक तीन भागों में बाँटा है। इतिहास हमें यह नहीं बताती कि पिछले युगों में मानव ने क्या किया? बल्कि यह बताती है कि तुम्हें भविष्य में क्या करना है तथा जो तुम कर रहे हो वह हर क्षण खत्म होता जा रहा है या इतिहास का रूप लेता जा रहा है।
इतिहास हमें बताती है कि जो आप कर रहे हंै वह करते ही उसी क्षण नश्वर होता है। कितना ही अच्छा या कितना ही खराब क्यों न करंे? वह नश्वर होगा। इतिहास यह भी बताती है कि आप चाहे कुछ करें या नहीं करें, दोनों का प्रभाव दूसरे व्यक्तियों पर पड़ता है।
जैसे मैं शराब पीता हूँ। तो मेरे इस कर्म से मुझे जानने वालों में कोई शराब पीने की तो कोई शराब न पीने की प्रेरणा ले सकता है, और यदि मैं शराब नहीं पीता हूँ तब भी मुझसे कोई शराब पीने की प्रेरणा ले सकता है, तो कोई न पीने की प्रेरणा ले सकता है। आप किस श्रेणी में आते है... एक श्रेणी सफल व्यक्ति की है तो एक असफल व्यक्ति की है।
लोक प्रशासन- शासन व प्रशासन में इतना ही अन्तर है कि शासन अच्छे या बुरे दोनों तरीकों का हो सकता है जबकि प्रशासन एक व्यवस्थित व हितकारी कार्य के संचालन का एक ढ़ंग या तरीका है। लोक प्रशासन इतना बताना चाहती है कि संगठन में ही पक्ति है। तथा यह पक्ति संगठित होकर कार्यो को करने से पैदा होती है।
हम अच्छे शासन करने वाले या लोगो को अपनी बात मनवाने मेें या अधिक से अधिक लोगांे को अपने साथ जोड़ने में कितने समर्थ है या अपनी बात को दूसरे के सामने कितनी अच्छी तरह से रख सकते हैं, क्योंकि एक योग्य एवं कुशल नेता ही राष्ट्र को खुशहाल बना सकता है।
राजनीति विज्ञान- राजनीति विज्ञान का उद्देष्य इतना ही नहीं कि आप नेता बनो या राष्ट्रपति बनने के लिए तुम्हारी क्या योग्यता होनी चाहिए? तथा बनने के बाद तुम्हें क्या-क्या कार्य करने हंै? या कैसे करने हैं? यह उसका छोटा सा आंकलन है क्योंकि हर व्यक्ति को तो राष्ट्रपति नहीं बनाना है। बल्कि जिस देष में तुम रह रहे हो उस देष की सरकार कैसे चल रही है? पूरे देष को एक सूत्र में बांध कर एक व्यक्ति द्वारा उसका संचालन कैसे चल रहा है?
उसमें आपके अनुसार अच्छा क्या हो या गलत कहाँ है? उसको समझना है। उसका उपयोग तुम अपने घर, समाज, संस्थान कम्पनी आदि में कैसे कर सकते हैं।
किसी न किसी दिन हर व्यक्ति को अपने घर की बागडोर संभालनी पड़ती है। जिस दिन घर की बागडोर आपके हाथ में आती है। उस दिन आप अपने घर के एक राष्ट्रपति हो या हर व्यक्ति को अपने घर समाज, संस्थान... आदि में कभी राष्ट्रपति, कभी प्रधानमंत्री तो कभी चपरासी की भूमिका निभानी पड़ती है।

अंग्रेजी, हिन्दी, संस्कृत-यह विषय नहीं है, बल्कि एक भाशा है।
भाषा-कोई भी दो सजीव जिनके बीच में भाषा न हो तो कुछ सीमा तक वह निर्जीव है। आप यह भी सोच सकते हैं कि जो व्यक्ति बोल नहीं सकता उसका भी तो काम चल रहा
फल आयेगा फिर में भूख मिटा लूँगा। बल्कि उसने पहले किसी पेड़ पर लगा फल देखा होगा फिर उसे चखा होगा और फिर खाकर अपनी भूख मिटाई होगी और उसे अपनी जरूरत का समझा, और जब भी भूख लगी या फल खाने की आवश्यकता पड़ी उसने उसका प्रयोग किया होगा।
फिर एक समय बाद सभी फल या उस पेड़ के फल खत्म होने या नश्ट होने के भय से या भविष्य की चिंता से यही सोचा होगा की इस पेड़ को कैसे उगा कर इसी तरह के अधिक मात्रा में फल प्राप्त कर सकता हूँ। तब जाकर हो सकता है उसका ध्यान उस गुठली पर गया होगा।
आप जितनी भी बड़ी-बड़ी या आश्चर्यजनक वस्तु देख रहे हो। उन सब वस्तुओं का बीज अवश्य होता है तथा वस्तुऐं उनका फल है। जडे़ आविष्कार कर्ता है तथा तना वह सामग्री हैं, जिनमें फल बना तथा टहनियाँ और पत्ते वह है जिनके द्वारा या जिन साधनों से आपको फल मिला तथा कांटे इन वस्तुओं से होने वाले नकारात्मक परिणाम है। आपने शास्त्रों या बुजुर्गो से सुना होगा कि कल्प वृक्ष नाम का ऐसा वृक्ष है। जो माँगो वैसा ही देता है या आपकी मनोकामनाओं को पूर्ण करता है। किंतु इस बात का अर्थ विज्ञान की भाशा में समझे तो वह कल्पवृक्ष आवश्यकता है या आवश्यकता जैसा ही है अर्थात् अपनी आवश्यकता को समझना विज्ञान का सबसे महत्वपूर्ण औचित्य या महत्त्व है।

विषयो को पढ़ने का तरीका


1.गणित-
-जोड़, बाकी, गुणा, भाग सभी अच्छे तरीके से करना आयें या इन्हें करने का अच्छा अभ्यास हो।
-स्टेप बाई स्टेप सवाल को करें प्रत्येक स्टेप के लिए नई लाइन का प्रयोग करें अर्थात दो स्टेप को एक लाइन में न लिखें।
-उत्तर नहीं आता है तो उसे प्रथम चरण से अर्थात् सवाल पढ़ने से ही उसको जाँचना प्रारम्भ करें। गलती मिलने पर उसमें काटा-पीसी न करके उस पूरी लाईन को ही काटकर लिखें।
-सवाल के जाचें को इस तरह से जमाये कि एक्जामिनर को पूरा सवाल एक नजर में समझ में आ जाये न कि चेक करने या समझने के लिए दिमाग खपाना पडे़।
-गणित में हमारी मुख्य गलती यह रहती है, कि सूत्र, कंसेप्ट, पहाडे़ हमारे क्लियर नहीं होने के कारण सवाल की विधि समझने में आने के बावजूद सवाल में बार-बार गलतियाँ होती है । जिससे गणित हमारे मन में कठिन या डरावना विषय+ बन जाता है। गणित को अरूचि से पढ़ने के कारण हमें समझने में दिक्कत आती है।
2.विज्ञान- विज्ञान चित्र या प्रयोग प्रधान विषय है। जितनारटेंगें उतनी ही गड़बड़ होगी। क्योंकि याद तो आप सीधा-सीधा करते हैं लेकिन पेपर में लिखते उल्टा-उल्टा है।
‘‘ विज्ञान चित्र प्रधान है।’’
यह सीखने का मूलमंत्र है। जिसमें जिस चीज की प्रधानता है, उसको ही पकडे़।
महात्मा गांधी में सत्य की प्रधानता है।
श्री राम में मर्यादा की प्रधानता है।
खेल में जीत की प्रधानता है।
पानी में ठण्ड़क की प्रधानता है।
इस प्रकार से हर विषय को देखें कि किस विषय में किसकी प्रधानता है। यदि आपने प्रधानता को समझ लिया तो आपकी उस विषय में पकड़ अच्छी हो जायेगी।
देवताओं में देने की प्रधानता होती है। महापुरूशों/गुरूओं में उनकी अपनी कोई न कोई प्रधानता होती है। उन्हें ढूँढ़ें तभी महापुरूषो/गुरूओं को समझ पायेंगे।
वैसे ही जीवन में जीने की प्रधानता को ढूँढे़ व शिक्षा में सीखने की प्रधानता ढूँढे़।
अर्थात् विज्ञान में चित्रों को देखें और समझें, तब ही सीख पायेगें। चित्र समझ में आयेगा तो आप उसके बारे में लिख सकोगे।
3.अंग्रेजी/हिन्दी- अंग्रेजी/हिन्दी विषय नहीं है, बल्कि एक भाषा है अर्थात् भाषा को सीखने या उसे बोलने का प्रयास करें
और हिन्दी/अंग्रेजी वही बोल सकता है जिसको इन भाशाओं के शब्द याद हो।
अर्थात् हिन्दी अंग्रेजी के शब्दों को याद करें।
अंग्रेजी बोलना कोई कठिन कार्य नहीं है, जैसे आप जिस क्षेत्र में जन्म लेते हैं, उस क्षेत्र की भाषा को किसी के द्वारा सीखाये बिना ही सीख जाते हैं।
किसी के द्वारा सीखना तो दूर की बात है। बल्कि व्यक्ति खुद भी अपनी तरफ से किसी प्रकार कोई ठोस चेष्टा या कठिन प्रयास एवं अभ्यास नहीं करता है उदा. हाड़ौती, हिन्दी,मराठी, गुजराती आदि।

वातावरण

विद्यार्थी या बच्चे का वातावरण बड़ा ही जटिल या विस्तृत है। जब बच्चा छोटा होता है तो वह इधर-उधर घूमता है या घर से बाहर घूमता है तो हम उसे टी.वी. के आगे बिठा देते है, अर्थात् टी.वी. देखना सिखाते हैं।
वहीं दूसरी तरफ हम अपने आॅफिस, संस्थाओं या अपने यार दोस्तों में बात चलती है, तो कहते हैं कि आजकल की पीढ़ी टी.वी. देख-देख कर बिगड़ रही है।
तीसरी तरफ हम चाहते हैं कि हम भी कोई डायरेक्टर, हीरो (स्टार) या संगीतकार होते या हमारा बच्चा इन सब में कोई एक बन के दिखाता ऐसी सोच भी रखते हैं। यह तो होता ही है, हमारे गाँव, शहर का व्यक्ति टी.वी. या फिल्मों में आता है तो ख़ुशी या जलन होती है अन्यथा तारीफ तो करते ही हैं, देखो क्या तरक्की की है, वह बहुत बड़ा हीरो या गायक बन गया है।
जहाँ एक तरफ हम बच्चों को बड़ा संगीतकार या कलाकार बनाना चाहते है। वहीं दूसरी ओर हम बच्चों को टी.वी. देखने, गाने सुनने से टोकते हैं।
एक तरफ तो हम अपने बेटे को सचिन जैसा बनाना चाहते हैं। वहीं दूसरी तरफ क्रिकेट खेलने या देखने से टोकते हैं।
आप सोच रहे होंगे कि ये कैसा उल्टा ज्ञान है, कि बच्चे तो पहले ही दिन-रात क्रिकेट देखते या खेलते ही रहते है और परीक्षा में फेल हो जाते हैं। यदि अपने बेटे से यह कहे कि क्रिकेट
विद्यार्थी या किशोरावस्था का युवक मुख्यतः निम्न चक्र केे बीच में है-
इस चक्र में जाना तो आसान है, व इस चक्र में जाना मजबूरी भी है और आज के युग में इस चक्र के बिना काम भी नहीं चल सकता है।
यदि आपके पास मोबाइल नहीं है, तो आपका काम मोबाइल के बिना चल रहा है। यदि आप मोबाइल ले लेते है। तथा साल भर मोबाइल रखते हैं, फिर आप चाहे कि मै मोबाइल नहीं रखँू तो यद फिर मोबाइल के बिना आप नहीं रह सकते हैं।
इस बात को हम जानते हैं, लेकिन फिर भी हम बच्चांे की आदत मोबाइल के प्रति आवश्यकता से पहले बना देते हैं। तथा बच्चों के जिद्द करते ही हम उसे मोबाइल दिलाते हैं। फिर हम ही कहते है कि दिन भर मोबाइल में लगा रहता है।
मेरे कहने का तात्पर्य यह नहीं कि मोबाइल गलत है। या मोबाइल से बच्चे बिगड़ते हैं।
जींस कितनी भी बढ़िया, मंहगी या कम्पनी की हो फिर भी लंगोट पहनने की उम्र में बच्चे को जींस नहीं पहनाते हैं।
आपने सुना भी होगा-
‘‘जहाँ काम करे सूई वहाँ तलवार का क्या काम है।’’
मोबाइल स्टूडेंट के लिए उपयोगी साधन है, इंटरनेट आपकी या आपके बच्चे की सुविधाओं को एवं ज्ञान को बढ़ाता है तथा चिन्ताओ को घटाता है जैसे आपको कभी आवश्यकता हो तो बात कर सकते हंै या उसे किसी भी प्रकार की असुविधा हो तो वह आपको षीघ्र सूचना पहुँचा सकता है। लेकिन उसकी आवश्यकता से पहले जानकारी देने से उसकी मानसिकता के विकास में बाधा पहुँचाना है।
आज के समय से पहले जब मोबाइल नहीं हुआ करते थे केवल टेलिफोन ही थे तब आपको स्वयं के अतिरिक्त कई नम्बर याद रहते थे। लेकिन जब से मोबाइल हाथ में आया हो सकता है, कि आपको अपने नम्बर भी याद नहीं हो बल्कि कोई नम्बर माँगे तो मिस काॅल को काम में लेते हंै।
एक बार एक संस्था द्वारा बच्चों को पिकनिक पर ले जाया गया। बस बीच में एक दो जगह ही रूकी होगी कि इनमें से एक बच्चा रास्ते में छूट जाता है और उसी दिन वह बच्चा अपना मोबाइल घर पर भूल आता है। बच्चा परेषान होता है, न तो साथ में मोबाइल है और न ही घर के किसी व्यक्ति के नम्बर याद है, और न ही पास में पैसे है, बच्चा पूरी तरह टूट जाता है, क्या करें? और काफी परेषान होता है फिर भी वह इतनी बुद्धि नहीं लगा पाता कि-
1.आॅटो करके उससे कहे कि मेरे पास पैसे नहीं है। घर पर छोड़ दो और मैं वहीं मम्मी/पापा से लेकर आपको किराया दे दूँगा।
2.न ही उसे अपने दोस्त के, स्कूल के, या पड़ोसी के नम्बर याद होते हैं। तथा न ही किसी के मोबाइल से काॅल करके घर पर सूचना पहँुचा पाता है।
3.किसी विश्वास पात्र को अपनी परिस्थिति बता कर पैसे माँग सके (यह भी आज के युग में कठिन कार्य है। क्योंकि आजकल बेवकूफ बना कर या परिस्थितियों या मजबूरियो का रोना रोकर यदि आपके पास मोबाइल नहीं है, तो आपका काम मोबाइल के बिना चल रहा है। यदि आप मोबाइल ले लेते है। तथा साल भर मोबाइल रखते हैं, फिर आप चाहे कि मै मोबाइल नहीं रखँू तो शायद फिर मोबाइल के बिना आप नहीं रह सकते हैं।
इस बात को हम जानते हैं, लेकिन फिर भी हम बच्चों की आदत मोबाइल के प्रति आवश्यकता से पहले बना देते हैं। तथा बच्चों के जिद्द करते ही हम उसे मोबाइल दिलाते हैं। फिर हम ही कहते है कि दिन भर मोबाइल में लगा रहता है।
मेरे कहने का तात्त्पर्य यह नहीं कि मोबाइल गलत है। या मोबाइल से बच्चे बिगड़ते हैं।
जींस कितनी भी बढ़िया, मंहगी या कम्पनी की हो फिर भी लंगोट पहनने की उम्र में बच्चे को जींस नहीं पहनाते हैं।
आपने सुना भी होगा-
‘‘जहाँ काम करे सूई वहाँ तलवार का क्या काम है।’’
मोबाइल स्टूडेंट के लिए उपयोगी साधन है, इंटरनेट आपकी या आपके बच्चे की सुविधाओं को एवं ज्ञान को बढ़ाता है तथा चिन्ताओ को घटाता है जैसे आपको कभी आवश्यकता हो तो बात कर सकते है या उसे किसी भी प्रकार की असुविधा हो तो वह आपको शिघ्र सूचना पहुँचा सकता है। लेकिन उसकी आवश्यकता से पहले जानकारी देने से उसकी मानसिकता के विकास में बाधा पहुँचाना है।
आज के समय से पहले जब मोबाइल नहीं हुआ करते थे केवल टेलिफोन ही थे तब आपको स्वयं के अतिरिक्त कई नम्बर याद रहते थे। लेकिन जब से मोबाइल हाथ में आया हो सकता है, कि आपको अपने नम्बर भी याद नहीं हो बल्कि कोई नम्बर माँगे तो मिस काॅल को काम में लेते हंै।
एक बार एक संस्था द्वारा बच्चों को पिकनिक पर ले जाया गया। बस बीच में एक दो जगह ही रूकी होगी कि इनमें से एक बच्चा रास्ते में छूट जाता है और उसी दिन वह बच्चा अपना मोबाइल घर पर भूल आता है। बच्चा परेशान होता है, न तो साथ में मोबाइल है और न ही घर के किसी व्यक्ति के नम्बर याद है, और न ही पास में पैसे है, बच्चा पूरी तरह टूट जाता है, क्या करें? और काफी परेशान होता है फिर भी वह इतनी बुद्धि नहीं लगा पाता कि-
1.आॅटो करके उससे कहे कि मेरे पास पैसे नहीं है। घर पर छोड़ दो और मैं वहीं मम्मी/पापा से लेकर आपको किराया दे दूँगा।
2.न ही उसे अपने दोस्त के, स्कूल के, या पड़ोसी के नम्बर याद होते हैं। तथा न ही किसी के मोबाइल से काॅल करके घर पर सूचना पहँुचा पाता है।
3.किसी विश्वासपात्र को अपनी परिस्थिति बता कर पैसे माँग सके (यह भी आज के युग में कठिन कार्य है। क्योंकि आजकल बेवकूफ बना कर या परिस्थितियों या मजबूरियांे का रोना रोकर

छोटी सी काॅमेडी

धोती-कहाँ जा रहा है?
पेंट-मेरे बाप को रोने।
धोती-बडे़ दुःख के साथ-यही तो संसार की रीत है जिसे चालू करते है वही एक दिन अचानक बंद होता है। इतना दुःखी मत हो आजकल भगवान् और पुलिस वालों ने मरने से पहले नहीं मरने के बाद संभालना चालू कर रखा है।
पेंट-मेरा बाप तो रोज मरता है साला, मुझको भेजता है पाठशाला।
धोती-तो क्या तुम पाठशाला जा रहे हो?
पेंट-अंधा है क्या? मैं यूनिफार्म और बैग तेरी मैयत में नाचने के लिए पहन के आया हूँ।
धोती-नाराज मत हो यह बता तेरा बाप पाठशाला में जाकर क्यों मरा?
पेंट-खुद तो पुलिस का कुत्ता है मुझे आर्मी का भेड़िया बनाना चाहता है।
धोती-लेकिन क्यों?
पेंट-खुद रिश्वत
लेकर तोंद बढ़ाता है।
लाचारों का पैसा जमीन में गाड़ता है।
मेरी देष के नाम पर कुर्बानी करना चाहता है।
अकेला ही धन अयाशी में उड़ाना चाहता है।
धोती-अब कुछ बात समझ में आती है और कहता है।
तेरा बाप रिश्वत लेता तो तुझे फौजी क्यों बनाना चाहता बल्कि और ज्यादा पैसा कमाने के लिए पटवारी, कलेक्टर बनाने की कोशिश क्यों नहीं करता?
पेंट-हाँ, ये बात तो है। फिर फौजी क्यों बना रहा है?
धोती-पुलिस में भर्ती होकर जिस देश पर शहीद होने का सौभाग्य खुद नहीं ले पाये वो तुम्हें दिलाना चाहते हैं।
पेंट-शर्मिदा होकर! अच्छा ऐसी बात है। मेरे पिताजी मेरे लिए क्या नहीं कर रहें और मैं निकम्मा का निकम्मा ही रह गया हूँ।

संगीत

मैं संगीतकार या गायक दोनों ही श्रेणी में नहीं आता हूँ न ही संगीत का अर्थ या परिभाषा जानता हूँ और शायद मैं ही नहीं मेरे जैसे कई व्यक्ति होगें फिर भी कुछ निम्न घटनाऐं अधिकतर व्यक्तियों में देखी जा सकती है।
गानों का मानसिक स्थिति से संबंध- जब व्यक्ति उदास होता है तो दुःख भरे गानें सुनता है या जब व्यक्ति रोमांटिक हो तो रोमांटिक गाने सुनता है। कोई भी व्यक्ति दुःख में रोमांटिक गाने नहीं सुनता लेकिन सुने तो शायद दुःख भूल जाये। वैसे रोमांटिक मूड़ में दुःख भरे गाने सुने तो रोमांटिकता चली जायेगी।
व्यक्ति जब दुःखी होता है, तो ऐसा नहीं है कि वह नहीं जानता कि में रोमांटिक गानें सुनू या रोमांटिक वातावरण में जाऊँ तो शायद मेरा दुःख कम या खत्म हो जायेगा लेकिन वह नहीं करता।
ठीक उसी तरह जिस तरह खुशी में उसे पता होता है कि यदि वह दुख भरे गानें सुने तो उसकी खुशी खत्म हो जायेगी किंतु ऐसा नहीं करता और कोई भी व्यक्ति ऐसा करे भी क्यों?
यह तो मूर्खता ही होगी ना खुशी के माहौल को दुःख में बदल ले यानी खुशी के प्रति उसका प्रेम है। जिसे वह खत्म नहीं करना चाहता।
इसी तरह व्यक्ति को अपने दुःख से भी प्रेम है यह बात साइलेंट है किंतु ऊपर से दिखता नहीं, क्योंकि उसे अपने दुःखो से प्रेम नहीं हो तो दुःख भरे गाने सुनना, अकेले रहना आदि काम न करके वह ऐसे काम करता है। जिनसे दुःख कम हो जाये जैसे रोमांटिक गाने सुनना अपने दोस्त के साथ खेलने या फिल्म देखना आदि कार्य करता है।

गानों का शिक्षा से संबंध -

याई रे याई रे जोर लगा के नाचे रे
याई रे याई रे मिल के धूम मचाये रे।
चल मेरे संग-संग ले ले दुनिया के रंग
हो जा रंगीला रे, रंग-रंग रंगीला रे।
याई रे याई रे ...
इतने चेहरों में अपने चेहरे की पहचान तो हो,
पहचान तो हो।
बडे़-बडे़ नामों में अपना भी नामों निशान तो हो,
पहचान तो हो,
निशान तो हो।
जीने में फिर तो क्या बात हो...
दिन नया और नई रात हो...
हर घड़ी बस खुशी साथ हो..
याई रे याई रे.....................
अरे यारों मेरे पास तो आओ
मेरी मुश्किल दूर भगाओ
केडबरी बोले में मिठा हूँ
अमूल बोले में मिठा हूँ
होर्लिक्स बोले में अच्छा हूँ
काॅम्पलेन बोले में अच्छा हँू
क्या सबने सोचा मैं बच्चा हँू
चोकलेट खाने में टेंषन है, दूध पीने में टेंशन है।
टेंशन, टेंशन, टेंशन
लानत है जी उस पर दुनिया में ही रहकर
दुनिया में जो जीने के अंदाज को न जाने।
माथे यहां थोपे चाँद या तारों में ।
किस्मत को ढूँढे़ पर खुद में क्या है ये न जाने।
खुद पे ही हमको यकीं हो।
मुश्किलें राह की आसां हो।
दोनों हाथों में ये जहां हो।
याई रे...
यदि हम इस बात को माने की गाने सुनने से बच्चे बिगड़ते हैं या गाने सुनना बच्चों के लिए अच्छा नहीं है
उदा.-गाने सुनने से बच्चे बिगड़ते हैं।
गाड़ी दिलाने से बच्चे बिगड़ते हैं।
गाड़ी चलाने से एक्सीडेंट होते हैं।
तो क्या उपरोक्त दोनों लाइनों में गाड़ी गलत है या गाड़ी में कोई बुराई है? या नहीं?
गाड़ी गलत नहीं है न ही गाड़ी में कोई बुराई है।
वैसे ही गाने गलत नहीं है न ही गानों में कोई बुराई है। हाँ कुछ-कुछ गाने गलत हो सकते हैं और ये बात तो सभी में है।
कुछ पुस्तकें भी मार्केट में गलत हो सकती है तो कुछ खाने-पीने की चीजे, व फिल्में भी मार्केट में गलत हो सकती है।
लेकिन उन गलतियों की ओर ध्यान देकर तो नहीं चला जा सकता, या कोई चलना भी चाहे तो भी नहीं चल सकता।
चाॅकलेट खाने में टेंशन है, दूध पीने में टेंशन है।
टेंशन, टेंशन, टेंशन
लानत है जी उस पर दुनिया में ही रहकर
दुनिया में जो जीने के अंदाज को न जाने।
माथे यहां थोपे चाँद या तारों में ।
किस्मत को ढूँढे़ पर खुद में क्या है ये न जाने।
खुद पे ही हमको यकीं हो।
मुश्किलें राह की आसां हो।
दोनों हाथों में ये जहां हो।
याई रे...
यदि हम इस बात को माने की गाने सुनने से बच्चे बिगड़ते हैं या गाने सुनना बच्चों के लिए अच्छा नहीं है
उदा.-गाने सुनने से बच्चे बिगड़ते हैं।
गाड़ी दिलाने से बच्चे बिगड़ते हैं।
गाड़ी चलाने से एक्सीडेंट होते हैं।
तो क्या उपरोक्त दोनों लाइनों में गाड़ी गलत है या गाड़ी में कोई बुराई है? या नहीं?
गाड़ी गलत नहीं है न ही गाड़ी में कोई बुराई है।
वैसे ही गाने गलत नहीं है न ही गानों में कोई बुराई है। हाँ कुछ-कुछ गाने गलत हो सकते हैं और ये बात तो सभी में है।
कुछ पुस्तकें भी मार्केट में गलत हो सकती है तो कुछ खाने-पीने की चीजे, व फिल्में भी मार्केट में गलत हो सकती है।
लेकिन उन गलतियों की ओर ध्यान देकर तो नहीं चला जा सकता, या कोई चलना भी चाहे तो भी नहीं चल सकता।
जैसे-
आये दिन कई जगह गैस की टंकिया फटती रहती है। तो क्या हम घर में गैस कनेक्शन नहीं लेते? आये दिन कोई न कोई करंट से चिपक जाता है तो क्या हम घर में लाईट कनेक्शन हटा देते है? या कनेक्शन ही नहीं लेते हैं?
गानों को हम सिर्फ मनोरंजन की दृश्टि से देखते आये हैं, क्योंकि गानांे का प्रयोग अधिकतम व्यक्ति मनोरंजन के लिए करते हैं।
यदि हम उन गानों के षब्दों को ध्यान से सुन कर तथा उनके अर्थ व भावों को समझे तो पायेंगे कि उनमें शैक्षिक, धार्मिक, आध्यात्मिक, सामाजिक आदि पहलुओं से सारगर्भित होते हैं।
याई रे याई रे जोर लगा के नाचे रे
याई रे याई रे मिलके धूम मचाये रे
नृत्य की ओर ध्यानाकर्शित है कि नृत्य का जीवन में बड़ा महत्त्व है।
चल मेरे संग-संग ले ले दुनिया के रंग
हो जा रंगीला रे रंग-रंग रंगीला रे
दुनिया रंगीन है, इसके रंगो में रंगकर ही दुनिया का आनंद ले सकते हैं या इस दुनिया से भाग कर या छिपकर कुछ नहीं कर सकते हैं।
इतने चेहरों में अपने चेहरे की पहचान तो हो
पहचान तो हो
जीवन का अद्भुत सार-
प्रत्येक व्यक्ति का जीवन तब ही उचित है, जब वह जीते जी कोई उचित/सम्मानित पद को प्राप्त करें या जीवन रहते/मरणोपरान्त उसका इस संसार में नाम हो।
बडे़-बडे़ नामों में अपना भी नामों निशान तो हो
पहचान तो हो निशान तो होे
जीने में फिर तो क्या बात हो
इस लाईन से यह संदेष मिलता है कि सभी जन्म लेते हैं और एक दिन मर जाते हैं लेकिन किसने जाना? किसने देखा? की कहीं कोई पैदा हुआ भी था। कुछ न कुछ ऐसा कर्म जरूर करे कि आप अमर हो अगर अमर न भी हो तो जीवित अवस्था में लोग आपको जाने।
दिन नया और नई रात हो
हर घड़ी बस खुशी साथ हो
दिन नया और नई रात हो अर्थात् जो हो चुका या बीत चुका उसे याद न करों। सिर्फ दुःख या मानसिक पीड़ाओं से सूखते रहोगे। यदि जो हो गया सो गया यह सोचकर भूल गये तो हर घड़ी आप खुश रहेगें।
दुःख सिर्फ पीछे के क्षणों के लिए होता है क्योंकि आगे आने वाले क्षणों को आप नहीं जानते हैं, कि अच्छा होगा या बुरा होगा।
उदाहरण-जब व्यक्ति फेल हो जाता है, तो दुःखी होता है न कि परिणाम आने से पहले क्योंकि पेपर बिगड़ने या पेपर में कुछ न करने के बावजूद भी इतनी आशा होती है कि कहीं किस्मत से पास हो जाये या भगवान् पास करा दें।
अरे यारों मेरे पास तो आओ
मेरी मुश्किल दूर भगाओ
यारों मेरे पास तो आओ मेरी मुश्किल दूर भगाओ।
मुश्किल में व्यक्ति को अकेले घर में नहीं बैठना चाहिए या तो अपनों के बीच में जाये या अपनों को अपने पास बुलाये यदि ऐसा करता है, तो जिन समस्याओं से हम जूझ रहे है, उनका कोई न कोई हल निकल जायेगा। न भी निकले तो अपने दुःख को दूसरों के सामने कह देने से दुःख हल्का हो जाता है।
केडबरी बोले में मिठा हूँ
अमूल बोले में मिठा हूँ
हाॅरलिक्स बोले में अच्छा हँू
काॅम्पलेन बोले में अच्छा हूँ
क्या सबने सोचा मैं बच्चा हँू
कई विज्ञापन आते हैं और कोई भी दुकानदार अपने खराब से खराब माल को अच्छा ही बताता है और अच्छा न बताये तो वह अपना सामान नहीं बेच पायेगा या बोलने वाले के तो भुगंड़े भी बिक जाते हैं। इन बातों को ध्यान में रखकर कि यह दुकानदार का धर्म है।
अतः हमें तो अपने हिसाब से जाँच परख कर यह तय करना है कि सब में अच्छा क्या है?
जैसे विद्यालय भी कई है और कोचिंग भी कई है ...
आदि हमें अपने अनुसार निर्णय लेना है, न कि विज्ञापन से या बड़ी-बड़ी बातों से बेवकूफ बनना है।
लानत है जी उस पर दुनिया में ही रहकर
दुनिया में जो जीने के अंदाज को न जाने
अगर दुनिया में जीना है, तो सबसे पहले आपको इस दुनिया में कैसे जीना है। इसका रास्ता खोजना ही है। चाहे आप स्वाध्याय द्वारा या बड़ो से पूछ कर या किसी भी तरह लेकिन आपको जीने का ढ़ंग जानना ही पडे़गा, नहीं तो जीना मुश्किल हो जायेगा जैसे आपको खाना बनाना है तो पहले आपको खाना बनाना सीखना ही पडे़गा।
चाॅकलेट खाने में टेंषन है, दूध पीने में टेंशन है।
टेंशन, टेंशन, टेंशन
हम दिन रात टेंशन में जीते है। लेकिन कोई टेंशन है ही नहीं सिर्फ हम अपने मन से किसी बात को टेंशन का रूप दे देते हैं जैसे दो बच्चे एक कागज के टुकड़े या किसी भी अमूल्य (कागज के टुकडे़) चीज के लिए लड़ पड़ते हैं और रोने लगते हैं और उसके लिए खाना पीना छोड़ देते हैं अर्थात् दुःखी या टेंशन में हो जाते हंै।
किस्मत को ढूँढे़ पर खुद में क्या है ये न जाने
खुद पे ही हमको यकीं हो
आध्यात्मिक दृष्टि-सब जीव परमात्म-तत्त्व के अंश आत्म- तत्त्व है। सागर के पानी में जो गुण विद्यमान है, वही गुण उस सागर में से निकाली गई बूंद में भी होता है।
गीता मै श्री कृष्ण भगवान् ने कहा है, सब मुझमें है, मैं सब में हूँ।
धार्मिक दृष्टि -किस्मत पुरुषार्थ से बड़ी नहीं है। पुरुषार्थ से किस्मत बनती है, न कि भाग्य से पुरुषार्थ बनता है।
मुष्किलें राह की आसान हो
दोनो हाथों में ये जहां हो
जिससे व्यक्ति का आत्मविश्वास दृढ़ होता है। उसके रास्ते की मुष्किले भी ड़रकर भाग खड़ी होती है फिर उसके दोनों हाथों में लड्डू जैसी स्थिति हो जाती है अर्थात् दोनों हाथों में जहां होना न कि स्वयं इस जहां की कठपुतली बनना या जहां की मुट्ठी में स्वयं को कैद करवा लेना कुछ व्यक्ति इस जहां में पैदा होते हैं और इस जहां को अपनी मुट्ठी में कस लेते हैं या कुछ लोगों को यह संसार अपनी मुट्ठी में लेकर मसल देता है, यमराज या मौत के रूप में।
इस गाने का अर्थ इतना ही नहीं बल्कि इससे भी कई, अधिक हो सकता है, यह तो सिर्फ मैंने मेरी जितनी सी बुद्धि थी उतना ही अर्थ सपष्ट कर रहा हूँ।
यदि सभी गानों को लिखित पुस्तक बना कर पढ़ा जाये या उन्हें ध्यान से सुना जाये तो ऐसा कौनसा ज्ञान है,जो गानों में छिपा नहीं मिलेगा। लेकिन हम उन्हें शिक्षा के नजरिये से देखते ही नहीं या देखते भी हैं, तो बहुत कम मात्रा में।

फिल्में

सभी बडे़ एक न एक दिन बच्चे थे और मैं भी पहले बच्चा ही था क्योंकि सीधे बडे़ न तो पैदा होते हैं, न ही आसमान से टपकते हैं।
जब मैं बच्चा था, मुझे भी कई कहानियाँ सुनने को मिली सुनकर आनंद भी आया और उन्हीं कहानियों को अपने ही समान दूसरे बच्चों को तोड़-मरोड़ कर या आधी-अधूरी सुना कर आनंद भी लिया जैसा कि सभी करते हैं।
मैंने सबसे पहली कहानी ‘‘थ्रस्टी क्रो’’ की सुनी या पढ़ी थी।
टीचर ने कहा कहानी याद करो, मैंने कर ली। टीचर ने कहा निष्कर्ष भी याद करो, मैंने कर लिया। कई बार पेपर भी हुआ, उसमें भी लिख दिया। हर बार नम्बर भी आये तथा पास भी हो गया।
लेकिन वह कौआ कौन था? क्यों उड़ा? क्यों भटका? क्यों प्यास लगी? क्यों मटका नजर आया? क्यों कंकड़ ड़ाले? क्यों पानी ऊपर उठा? फिर प्यास क्यों बुझी? फिर क्या निष्कर्ष निकला? वह तब समझ में आया जिस दिन शायद जब मैंने पहले दिन स्वयं काम करके पैसा कमाया।
• कि वह कौआ मैं था, जैसे वह पैदा हुआ, वैसे ही मैं भी पैदा हुआ, वो बड़ा हुआ, वैसे ही मैं भी बड़ा हुआ, जैसे बड़ाहोने पर मुझे मेरी मंजिलो को ढूंढ़ने के लिए निकलना पड़ा उसने भी इसी सोच से उड़ान भरी थी। लेकिन संसार एक भूल-भूलैया है। इसमें मंजिल की तलाश में निकलते हैं, तो भटकते ही हैं। तथा कई मुष्किलें, परेशानियाँ परिस्थितियाँ घटती है, जैसे उसके सामने प्यास लगने की परिस्थिती घटी थी, अर्थात् प्यास लगे बिना, परिस्थितियाँ घटे बिना, कोई पानी की तलाश नहीं करता और सच्चे मन से की गई कोशिश कभी निरर्थक नहीं होती। लेकिन वह पानी नहीं पी सका क्योंकि पानी बहुत कम (बहुत नीचे) था। ठीक वैसे ही मंजिल बहुत दूर या बहुत गहराई में छिपी होती है। मंजिल आसानी से नहीं मिलती मेहनत करनी पड़ती है, अर्थात् समझदारी से काम लेना पड़ता है। हड़बड़ाने से या हिम्मत हारने से काम नहीं चलता। वही उसने किया, फिर प्रयास निरर्थक नहीं गया उपाय नजर आया कंकड़ ड़ाले,परंतु कंकड़़ डालने के लिए भी भूख-प्यास से पीड़ित होने के बावजूद जी-जान लगाकर मेहनत करनी पडे़गी। वह इस बात को जानता था। अतः उसने की और प्यास बुझाई, तथा मंजिल मिली अर्थात् मंजिल को प्राप्त कर लिया।
क्योंकि कार्य फल दिये बिना नहीं रह सकता। जैसा कार्य करोगे वैसा फल मिलेगा, जो बोओगे वही काटोगे।
अर्थात् मैं तीसरी कक्षा से एम.ए., बी.एड. तक सिर्फ उस कहानी को पढ़ता पढ़ाता या दूसरों को सुनाता रहा अर्थात् में उन शब्दों का (कौआ, कंकड़, मटका, और निष्कर्ष आदि) बोझ ढ़ोता रहा हूँ।
कहने का अर्थ यह है कि फिल्में सिर्फ कहानी है। शब्दों का कोई बोझ न ढ़ोये। उसे जीवंत बनाया नाटकीय पात्रों (फिल्मों) द्वारा मगर फिर भी न समझे और कहानी या शब्दों का ही बोझ नहीं बल्कि अब पात्रों का व पात्रों की वेशभूषा और डायलाॅग का बोझ ढ़ोने लग गये।
मतलब पहले कम बेकार थे। अब फिल्मों से ज्यादा बेकार बन गये। जिसका अर्थ यह निकला कि फिल्मों से बच्चे ज्यादा बिगड़ रहे हैं। फिल्में यह नहीं बता रही है कि हम भी वैसा करें जो फिल्मे बता रही है, बल्कि जो इस संसार में हो रहा है, उसे आपके सामने प्रदर्शित कर रही है।
जैसे अखबार में आता है।
ये फिल्में उनके लिए है जो माता-पिता के कहने पर या किताबें पढ़कर भी नहीं समझ सकें उन्हें नाटक व फिल्मों के द्वारा समझाने की कोशिश की गई है इसलिए टी.वी. को सूचना तकनीक का साधन कहते हैं न कि मनोरंजन का साधन।

chapter-7 समस्या - समाधान

प्रश्न 1ः-पढ़ाई करने के लिए कौनसा समय उपयुक्त होता है?
उत्तर:-जब तेज भूख लगती है तो कोई यह नहीं देखता कि समय उपयुक्त है या नहीं, बस इतना ही देखता है कि भूख को शांत किस तरह किया जाये, और जब भूख नहीं हो तो उपयुक्त से उपयुक्त समय में भी कोई आपके सामने स्वादिष्ट भोजन परोस दे तब भी आप ग्रहण नहीं करोगे।
अध्ययन, स्वाध्याय, पूजा, जप, तप, साधना आदि कार्य तो समय से भी शुभ कार्य है। जिस समय करने बैठो वही समय शुभ या उपयुक्त हो जायेगा। इस नजरिये से देखा जाये कि शुभ कार्यो को शुभ समय में करने से उचित लाभ प्राप्त होता है तब सबसे अच्छा समय ब्रह्म मुहूर्त का है। रोजाना ब्रह्म मुहूर्त के समय पढ़ना ज्यादा लाभकारी या हितकारी होता है।
यह ऐसा समय होता है, जब आप सो कर उठते हैं,तब आपके मन की सभी वृत्तियाँ दूसरे समय की अपेक्षा काफी शांत होती है।
प्रश्न 2ः- हमारी सुबह जल्दी नींद नही खुल पाती?
उत्तरः- सुबह जल्दी उठने के कई तरीके है जैसे- अलार्म भरके सोना या अपने माता-पिता से कहना कि समय पर उठायें।
दूसरी बात यह भी है कि यदि आप रोज दिन में 12 बजेखाना खाते हैं, तो जिस दिन भोजन ग्रहण नहीं करोगे उस दिन 12 बजे आपको भूख लगने लग जायेगी। वैसे ही 12 बजे की बजाय प्रातः 10 बजे भोजन ग्रहण करने लग जाओ तो रोज आपको प्रातः 10 बजे भूख लगेगी।
जैसे भूख, प्यास है वैसे ही नींद भी है। समय पर सोओगे तो समय पर उठोगें, अर्थात् 8 दिन रोजाना 8ः00 बजे का अलार्म भर के सोते है। तो अगले दिन बिना अलार्म भरे 8 बजे नींद खुल जायेगी और आपने देखा भी होगा आप ही के घर में आपसे बडे़ जिन्हें सुबह आॅफिस बैंक, विद्यालय आदि में जाना होता है तो उनकी सही समय पर रोज नींद खुल जाती है।
प्रश्न 3ः- पढ़ने बैठते ही आलस क्यों आते हैं?
उत्तर- जब आप फिल्म देखते हैं, खाना खाते है, खेलते है, तब तो आलस नहीं आते क्योंकि वह कार्य आप अपनी पूर्ण रूचि से कर रहे हैं, इसलिए आलस नहीं आते या जब आप खेलते या फिल्म देखते हैं। तब आपकी आँखे, आपका मन और बुद्धि तीनो सक्रिय रहते हैं। अतः जब आपकी रूचि हो तब ही पढ़ने बैठे यदि रूचि नहीं है, तो उस समय पर आप अन्य कार्य करें। जब रूचि कम हो तब गणित के सवाल हल करें या लिखने से सम्बन्धित विषयों का अध्ययन करें।
प्रश्न 4ः-हम जब भी कोई कार्य करते हैं तो उसमें अड़चने क्यों पैदा होती है?
उत्तरः-सफलता - विश्वास, श्रद्धा, समर्पण, निष्ठा
असफलता - अविश्वास, घमण्ड़, अभिमान, अंहकार
विश्वास दृढ़ होता है तो श्रद्धा के भाव बढ़ते हैं। जब समर्पण के भाव दृढ़ हो जाते हैं, तब निष्ठा के भाव पैदा होते हैं। जो भावों की इस श्रेणी से चलता है उसका प्रत्येक कार्य सही होता चला जाता है।
किंतु हमारे हर कार्य में अड़चने पैदा होती है या सही करने पर भी अड़चनें या परेशानियां उत्पन्न होती है तो समझे कि आप अविश्वास, घमण्ड़, अभिमान, अंहकार की श्रेणी मै चल रहे हैं या यह सब कहीं न कहीं आप में है लेकिन दिखाई नहीं दे रहें है।
प्रश्न 5ः- किसको रात में नींद नहीं आती ?
उत्तरः-जिसका बलवान के साथ विरोध हो गया है उस साधनहीन दुर्बल मनुष्य को, जिसका सब कुछ हर लिया गया है उस कामी को तथा चोर को रात में जागने का रोग लग जाता है। अर्थात आप पढ़ने से कभी जी न चुरायें।
प्रश्न 7ः- हम पढ़ने तो बैठ जाते हैं लेकिन मन एकाग्र नहीं होता है?
उत्तर:- लक्ष्य$दृढ़ इच्छा$जूनून व पूर्ण रूचि पैदा करे तथा लक्ष्य को सामने रखकर अपनी इच्छा को दृढ़ कर जोष से पढ़ें तो पढ़ाई के प्रति मन एकाग्र हो जायेगा।
प्रश्न 8ः- लगातार अधिक समय तक पढ़ने के लिए नहींबैठ पाते ?
उत्तरः- 5 मिनट से 10 मिनट , 10 मिनट से 20 मिनट ... लगातार इस तरह बैठने का अभ्यास करना पडे़गा।
प्रश्न 9ः- अध्यापक से पूछने से डरते हैं?
उत्तरः-वही बच्चे अध्यापक से डरते हैं। जिनमें स्वयं में कमी अर्थात् जो घर पर स्वयं नहीं पढ़ते हैं या जितना पढ़ाया उसका स्वयं के द्वारा अध्ययन नहीं किया हो।
प्रश्न 10ः- हम याद करने पर भी भूल जाते हैं?
उत्तरः- याद करना तो आसान है किंतु भूलना असंभव है। भूलना संभव होता तो कोई भी अपना नाम भूल जाता याद करें किंतु कच्चा नहीं पक्का करें।
प्रश्न 11ः- हम पढ़ने का टाइम-टेबल बनाते हैं किंतु उस पर चल नहीं पाते ?
उत्तर:- आप टाइम-टेबल पढ़ने का नहीं बल्कि इतने बजे उठना है, इतने बजे फ्रेश होना है, इतने बजे भोजन करना है, इतने बजे पढ़ना है, अर्थात् दिनचर्या का टाइम-टेबल बनाते हैं और दिनचर्या का समय निर्धारित नहीं हो सकता।
आप टाइम-टेबल बनाने के बजाय यह निर्धारित करें कि मुझे रोज 5 घंटे पढ़ना ही है तो आप ऐसा करने में सफल होगें।
प्रश्न 12ः- मेरे दोस्त बिना पढ़े या कम पढ़कर भी अच्छेअंक ले आते हैं। लेकिन मैं दिनभर पढ़कर भी क्यों नहीं ला पाता?
उत्तर:- अपना वह कार्य ढूढ़ो जिसे तुम अपने मित्र की अपेक्षा बहुत कम अभ्यास या बिना अभ्यास के ही उससे अधिक बेहतर ढ़ंग से कर सकते हो फिर उस कार्य के अंदर स्वयं या अपने मित्र के अभ्यास, लगन, रूचि की तुलना करों।
अर्थात् तुम तुम्हारे मित्र द्वारा पढ़ने में लगाये गये समय को तो देख पा रहे हो मगर उसकी पढ़ने के प्रति लगन, रूचि, उत्साह व एकाग्रता को नहीं देख पा रहे हो।
प्रश्न -कितना ही पढे़ लेकिन याद नहीं होता है या भूल जाते हंै।
उत्तर-यदि आप फिल्म देखते हैं और देखने के बाद आपको उस फिल्म की कहानी याद रहती है तो समझों की आपकी याददास्त अच्छी है, तथा मस्तिश्क सम्बन्धित कोई बीमारी नहीं है
याददास्त (मेमोरी)-हमारे सिर में ऐसी कोई न कोई जगह है जहाँ पर आंकड़े व तस्वीरें स्टोर (जमा) होती है उसे याददास्त कहते है। हमारी याददास्त असीमित होते हुये भी सबकी याददास्त की स्वयं के द्वारा विकसित करने के आधार पर क्षमता अलग-अलग है जैसे मेमोरी कार्ड 2 जीबी, 4जीबी के होते हैं। मेमोरी कार्ड के भरने के बाद कुछ भी थोड़ा बहुत उसमें स्टोर करना असंभव होता है जैसे कि भरे हुये मटके में एक बूंद भी डाले तो वह बाहर आ जाती है।
ठीक वैसे ही हमारी याददास्त में जैसे ही हम किसी कोध्यान से देखते है तो उसकी तस्वीर, सुनते है तो आवाज, पढ़ते है तो आंकड़े स्टोर हो जाते हंै। अतः अपनी याददास्त खाली रखें या उसमें फालतू के आंकड़ो के भरने से बचें। जिस व्यक्ति को ध्यान से देखा उसकी तस्वीर भर गई और ध्यान न दिया तो नहीं भरी।
इस तरह हम हमारी याददास्त को अच्छी बनायेगें तो जो भी याद करगें नहीं भूलेंगे तथा याद करने की क्षमता भी बढ़ा सकते हैं

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